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Category: समाज

टमाटर के पत्तियों में मोड़‑फेर: किसानों को झेलना पड़ रहा नीति‑संघर्ष की नई लकीर

उत्तरी मध्यप्रदेश के कई छोटे‑से‑छोटे टमाटर के बाग़ींचे हाल ही में एक विचित्र लक्षण दिखा रहे हैं – नीचे के पत्ते ऊपर की ओर मुड़ रहे हैं, जबकि नव‑विकसित टहनी पर कर्लिंग उल्टा, कभी‑कभी उलझी हुई। किसानों ने इसे पहली बार हल्की‑फुसफुसाती बीमारी समझा, पर अनुभवी कृषि वैज्ञानिकों ने इसे तीन बुनियादी कारणों से जोड़ा: अत्यधिक ताप, जल‑कमी और कीटनाशक‑ड्रिफ्ट।

पहला कारण – गर्मी एवं पानी की कमी – साधारण ही नहीं। भारत में बदलते मौसम पैटर्न के साथ, कई क्षेत्रों में गर्मी के दिन लगातार 40 डिग्री से ऊपर पहुँच रहे हैं, जबकि ग्रामीण जल‑संकट ने सिंचाई की सुस्ती को बढ़ा दिया है। जब पानी शुद्ध नहीं पहुँच पाता, तो टमाटर की पत्तियां स्वयं को बचाने के लिये ऊपर की ओर मोड़ लेती हैं, जैसा कि कई छोटे किसान ने अपने खेतों में प्रत्यक्ष देखा।

दूसरा कारण – एफ़िड जैसे कीटों का समुचित प्रबंधन न होना – यह समस्या अक्सर अनजाने में उत्पन्न होती है। एफ़िड के लार में युक्त हार्मोन पत्तियों को डिक्लाइन कर देते हैं, जिससे नई टहनी पर घुंघराली बनावट आती है। ग्रामीण स्तर पर कीट प्रबंधन के लिए उपलब्ध प्रशिक्षण एवं रसायनों की समयबद्ध आपूर्ति में अंतराल, इस समस्या को और बढ़ा रहा है।

तीसरा कारण – हरबिसाइड या अन्य कृषि रसायनों का ‘ड्रिफ्ट’ – नजदीकी खेतों में अत्यधिक रासायनिक धातु के प्रयोग से वायु द्वारा टमाटर के पौधों तक पहुँचना आम हो गया है। इस प्रकार का ड्रिफ्ट न केवल पत्तियों को विकृत करता है, बल्कि धान‑बाजार में बोझ भी बढ़ाता है।

इन बुनियादी कारणों के बावजूद, प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर शब्द‑भंडार तक सीमित रह गई है। जल आपूर्ति विभाग के नए मोबाइल ऐप को अभी भी पेपर‑रिकॉर्ड से जुड़ने की जरूरत है, जबकि किसानों को सही समय पर सिंचाई सूचना नहीं मिल पाती। साथ ही, राज्य कृषि विभाग की कीट‑नियंत्रण योजनाएँ अक्सर बजट‑कट के कारण आधी राह में ही रुक जाती हैं, जिससे एफ़िड जैसे छोटे‑मात्रा के कीट भी आर्थिक नुकसान का कारण बनते हैं।

टमाटर, जो दैनिक पोषण का एक अहम स्रोत है, की इस बीमारी का सामाजिक प्रभाव नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। छोटे‑छोटे बागीचे के किसान, जिनमें बहुतेरे महिलाएं प्रमुख भूमिका निभा रही हैं, अपने घर की आय के प्रमुख स्रोत को जोखिम में देख रहे हैं। फसल क्षति के कारण बाजार में टमाटर की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए आवक भोजन महँगा हो जाता है।

सार्वजनिक रूप से देखा जाए तो इस समस्या का समाधान नीतियों में निहित है: समय पर जल‑सहायता, कीट‑रोकथाम के व्यापक प्रशिक्षण, और रासायनिक उपयोग पर कठोर निगरानी। प्रशासनिक लापरवाही के कारण न केवल किसान की आजीविका पर असर पड़ता है, बल्कि खाद्य उपलब्धता और सामाजिक स्थिरता पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।

व्यंग्य तो बस इतना ही है कि जहाँ किसान अपनी फसल बचाने के लिए निरंतर निरीक्षण कर रहे हैं, वहीं सरकार की योजनाएँ कागज़ी रूप में ही मोड़-मरोड़ करती दिख रही हैं। संकल्प यही है कि अब नीति‑कार्यान्वयन से पहले बाग़ीचे की पत्तियों की झ्पीट-झ्पीट ध्वनि सुनी जाए, ताकि आगे की कड़ियाँ समय पर पुख्ता हो सकें।

Published: May 5, 2026