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Category: समाज

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ट्रेन में सीटबेल्ट न होने का कारण: सुरक्षा नीति में खाइयाँ और प्रशासन का रूख

विश्व भर में रेल को सबसे सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन माना जाता है, फिर भी अधिकांश ट्रेनों में सीटबेल्ट नहीं मिलते। यह विरोधाभास सिर्फ तकनीकी कारणों से नहीं, बल्कि नीति‑निर्धारण में झलकती असंगतियों से भी जुड़ा है।

त्रैक‑निर्धारित मार्ग, धीमी गति में कमी और विस्तृत इन्फ्रास्ट्रक्चर – इन सब को ले कर विशेषज्ञ कहते हैं कि ट्रेनों को कार या विमान की तरह अचानक टक्करों की संभावना बहुत कम होती है। इसके अलावा, आधुनिक ट्रेनों के अंदरूनी हिस्से ऊर्जा‑शोषी सामग्री से बने होते हैं, जो हल्की झटके को आसानी से सहन कर लेते हैं। ऐसी परिस्थितियों में सीटबेल्ट लगाना उल्टा नुकसान पहुँचा सकता है, क्योंकि टक्कर के समय बेल्ट की जकड़न से सवारों को गंभीर चोटें लग सकती हैं।

जापान की शिंकेंसेन से लेकर यूरोप के हाई‑स्पीड नेटवर्क तक, कई विकसित प्रणाली बिना सीटबेल्ट वाली ही चलती हैं, और इसके लिए वे अपनी सुरक्षा को अन्य उपायों से सुदृढ़ करती हैं – जैसे कि धातु‑बिना फर्नीचर, फॉलबैक वॉल्टेज, और तेज़ी से खुलने वाले डोर।

इसी संदर्भ में भारतीय रेल को देखना पड़ता है। भारत में प्रतिदिन लाखों यात्रियों की भीड़ को सुरक्षित ले जाने की जिम्मेदारी रेलवे के पास है, फिर भी सीटबेल्ट के प्रश्न पर उत्तर बहुत हद तक मौन बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में ट्रेन‑धक्कों की घटनाएँ, विशेषकर तेज़ी से चलने वाली एक्सप्रेस और मेट्रो‑सेवा में, ने सुरक्षा के प्रति जनजागरूकता को बढ़ा दिया है, लेकिन नीति‑निर्माताओं ने अब तक कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया।

पर्याप्त विशेषज्ञ सलाह के बावजूद, रेल मंत्रालय की आधिकारिक प्रतिक्रिया अक्सर “ट्रेन का बुनियादी ढाँचा सुरक्षित है” तक सीमित रहती है। जबकि यह कहा जा सकता है कि ट्रैक‑नियंत्रण और ब्रेकिंग सिस्टम बेहतर होते जा रहे हैं, लेकिन यात्रियों की भीड़भाड़, अपर्याप्त रख‑रखाव और जंग‑लगी पटरियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यहाँ पर ‘भारी-भारी बुलेट ट्रेन’ के चक्कर में प्रशासन ने सुरक्षा उपायों के सामंजस्य को खो दिया है – गति बढ़ाने की घोषणा तो करता है, लेकिन उसके साथ जुड़ी तकनीकी सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देता।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो, ट्रेन यात्रा भारतीय मध्य‑वर्ग और कामकाजी वर्ग के लिए सस्ती और भरोसेमंद साधन है। सीटबेल्ट की अनुपस्थिति में गिरते हुए खिड़की के कांच, असुरक्षित कुर्सियाँ, और अचानक ब्रेक लगने पर झटकने के जोखिम को लेकर यात्रियों के बीच बढ़ती असंतुष्टि सुलझी नहीं है। इस असंतोष को दूर करने के लिए न केवल तकनीकी पुनर्गठन, बल्कि एक स्पष्ट, समयबद्ध नीति‑परिवर्तन की भी आवश्यकता है।

विचार यह नहीं कि सीटबेल्ट टोटे‑टोटे समाधान है; बल्कि यह है कि सुरक्षा के हर पहलू को समान रूप से महत्व दिया जाए। यदि ट्रेन‑डिज़ाइन में ऊर्जा‑शोषी संरचनाएँ पर्याप्त नहीं, तो बैक‑ऑफ़ सिस्टम, फ़ायर‑साइलेंट अलार्म, और तेज़‑तीव्रता वाले एमरजेंसी‑ब्रेक का उपयोग बढ़ाना चाहिए। इसके अलावा, यात्रियों को सजग बनाने के लिए नियमित सुरक्षा ब्रीफ़िंग और बेहतरीन सूचना‑प्रौद्योगिकी (जैसे कि प्रत्येक कार में वाइब्रेशन‑सेंसर्स) को अपनाया जा सकता है।

अंत में कहा जा सकता है कि ट्रेन में सीटबेल्ट न होने की वजह सिर्फ़ “तकनीकी बाधा” नहीं, बल्कि नीति‑निर्माण में मौजूदा निरंतरता का परिणाम है। यदि प्रशासन “सुरक्षा” शब्द को केवल ‘ट्रैक‑मैन्टेनेंस’ तक सीमित रखेगा, तो जनता को इस बात का आराम नहीं मिलेगा कि जल्द‑बाज यात्राओं में उनका जीवन भी सुरक्षित है। यही वह बिंदु है जहाँ नीति‑निर्माताओं को अपने ‘गति‑के‑नाम‑पर’ गुणी‑बिल्बोर्ड से हटकर व्यावहारिक, समग्र और मानव‑केन्द्रित सुरक्षा उपायों की दिशा में कदम बढ़ाने की जरूरत है।

Published: May 7, 2026