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Category: समाज

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टेड टर्नर के निधन से उठे भारत में 24×7 समाचार मॉडल की जवाबदेही पर सवाल

अमेरिकी मीडिया दिग्गज टेड टर्नर का 87 वर्ष की आयु में निधन दुनिया भर में शोक संदेश लेकर आया। उन्होंने 1980 के दशक में सीएनएन को दुनिया का पहला निरंतर‑समाचार चैनल बना दिया, जिससे वैश्विक सूचना प्रणाली में एक नया युग शुरू हुआ। यह मॉडल कई साल बाद भारत में भी अपनाया गया, जहाँ निजी‑ख़बरातों ने सरकारी प्रसारण को चुनौती देना शुरू कर दिया।

सीएनएन की निरंतर समाचार संकलन ने भारतीय मीडिया को तेज़ गति, निरंतरता और ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की आदत सिखाई। बहरहाल, इस तेज़ी से सूचना प्रवाह ने दोधारी तलवार का काम किया। स्वास्थ्य‑समाचार में त्वरित चेतावनी और महामारी‑सूचना का प्रसार संभव हुआ, परंतु असत्य और अफ़वाओं का भी दोहराव बढ़ा। शिक्षा‑विषयक सूचना के अथक विस्तार ने छात्रों को एनालिटिक सोच के लिए उत्तेजित किया, परंतु शैक्षणिक विमर्श को कभी‑कभी सतही विज्ञापन‑भारी ख़बरों से घिसा‑पिटा भी।

भारत में 24×7 चैनलों का विस्तार शहरी‑ग्रामीण असमानता को और उजागर करता है। जहाँ शहरी क्षेत्र में हाई‑स्पीड इंटरनेट और सैटेलाइट डिश के माध्यम से निरंतर समाचार पहुँचता है, वहीं कई दूरस्थ गाँवों में अभी भी केवल सीमित रेडियो या मोबाइल डेटा उपलब्ध है। इस डिजिटल विभाजन से सूचना का असमान वितरण पैदा होता है, जिससे सामाजिक विषमता में नई परत जुड़ जाती है।

नियामकीय ढांचा इस नई वास्तविकता के साथ तालमेल बिठाने में पीछे रह गया है। समाचार चैनल व्यावसायिक मॉडल के तौर पर विज्ञापन पर अत्यधिक निर्भर हैं, जबकि सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य दायित्व बन चुका है। भारत में समाचार प्रसारण पर मौजूदा नियम अक्सर ‘स्वतंत्रता’ शब्द का हवाला देते हुए वास्तविक जवाबदेही को टालते हैं। यह वही कहानी है, जहाँ सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना पिरोती है, पर निरंतर‑समाचार की गुणवत्ता‑नियंत्रण में भीड़‑भाड़ में खो जाती है।

टेड टर्नर ने जो प्लेटफ़ॉर्म बनाया, वह अब भारतीय समाज में दुष्प्रभाव व लाभ दोनों का स्रोत बन चुका है। इन कमजोरियों को पहचानकर ही नीति निर्माताओं को एक सुदृढ़, पारदर्शी व सामाजिक उत्तरदायित्व‑परक नियामक ढांचा तैयार करना होगा। दूरस्थ क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाने, समाचार सत्यापन संस्थानों को सुदृढ़ करने और विज्ञापन‑आधारित आय पर निर्भरता को संतुलित करने के कदम जरूरी हैं।

टर्नर की विरासत को केवल ‘बड़े व्यक्तित्व’ के रूप में याद नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि यह प्रश्न भी उठना चाहिए कि ऐसी शक्ति‑केन्द्रित मीडिया मॉडल के साथ सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य‑सुरक्षा और शैक्षिक साक्षरता को कैसे संतुलित किया जाए। तभी 24×7 समाचार प्रणाली भारत में जानकारी के सशक्तिकरण का साधन बन पाएगी, न कि द्वंद्वात्मक अराजकता का कारण।

Published: May 6, 2026