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टैगोर के उद्धरणों से प्रेरित नई स्कूल योजना में प्रशासनिक अड़चनें, बच्चों को मिली अधूरी उम्मीद
रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म दिवस ७ मई को भारत भर में याद किया गया, पर इस वर्ष का उत्सव सिर्फ कवित्ती सत्रों तक सीमित नहीं रहा। कई राज्य शिक्षा विभागों ने घोषणा की कि टैगोर के विचारों—संभावना, रचनात्मकता और सत्य—को प्राथमिक पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाएगा, ताकि बच्चों में संवेदनात्मक विकास और जीवन की धीरज को प्रोत्साहन मिले।
पर योजना की घोषणा के साथ ही एक सूक्ष्म‑सुव्यवस्थित विफलता भी सामने आई। उदारहण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण जिलों में “स्मार्ट टैगोर पद्धति” के नाम से शुरू किया गया प्रोजेक्ट, निधि की देर से विमोचन, प्रशिक्षक की कमी और बुनियादी सामग्री की लॉजिस्टिक बाधाओं के कारण आवंटित स्कूलों में लापरवाह ढंग से फले‑फूले नहीं। ऐसे स्कूल जहाँ आधी आबादी सामाजिक‑आर्थिक असमानता से प्रभावित है, वहाँ एक पंक्तिबद्ध उद्धरण‑प्यालेट की जगह धूल‑भरी दीवारें ही रहती हैं।
प्रभावित वर्ग स्पष्ट है: प्राथमिक शैक्षणिक वर्ष में प्रवेश कर रहे ग्रामीण बच्चों, जिनके पास न तो समृद्ध पुस्तकालय है न ही प्रशिक्षित शिक्षक। इस वर्ग की मानसिक‑सम्पदा को सुदृढ़ करने के लिये टैगोर के “धी मी चलो” जैसी वाक्यांशों को उपयोगी बनाने की नीति, अब केवल कागज पर ही बनी हुई है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखे तो, भावनात्मक विकास के लिये नियोजित यह पहल, स्कूल‑आधारित काउंसलिंग के अभाव में मानसिक स्वास्थ्य के बोझ को नहीं घटा पाएगी।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया में राज्य के शिक्षा सचिव ने कहा, “यह एक चरणबद्ध कार्य है, प्रारम्भिक त्रैमासिक में सभी स्कूलों में पूर्ण रोल‑आउट होगा; वर्तमान में कुछ ‘पायलट’ स्कूलों में परीक्षण चल रहा है।” ऐसी टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि योजना की गति टैगोर के स्वयं के “धीरे चलो” के नारे को भी मात दे रही है। जबकि नीति‑निर्माता तेज़ी से बदलाव की बात करते हैं, वास्तविकता में वह सरकस‑जैसे अधूरा चक्र है, जहाँ प्रत्येक मोड़ पर नई मंजूरी की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
सिविल‑सॉस समाज संगठनों ने इस असंगतिमा को उजागर किया, और मांगे हैं कि निधि को तुरंत जारी किया जाए, शिक्षक प्रशिक्षण मॉड्यूल को डिजिटल बनाकर दूरस्थ क्षेत्रों में पहुँचाया जाए, तथा मॉनिटरिंग‑बोर्ड स्थापित किया जाए जो वास्तविक कार्यान्वयन को ट्रैक करे। माता‑पिता की कड़वी आवाज़ इस बात पर बनी रहती है कि “टैगोर की रचनात्मकता हमें दी नहीं, लेकिन उनके उद्धरणों की धूल तो दी ही गई।”
निष्कर्षतः, टैगोर के विचारों को शैक्षणिक ढाँचे में लाने का उद्देश्य सराहनीय है, पर उसकी सफलता तभी सम्भव होगी जब योजना‑को‑कार्यान्वयन में तार्किक, वित्तीय और मानव‑संसाधन के ‘टैगोर‑संकल्प’ को वास्तविकता में बदलने की प्रतिबद्धता दिखाई दे। नहीं तो यह पहल एक और अधूरी हस्ताक्षर बन कर रह जाएगी, जो केवल मौखिक प्रशंसा से सार्वजनिक जवाबदेही को नहीं बचा पाएगी।
Published: May 7, 2026