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Category: समाज

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झारखंड इंटरमीडिएट 2026 में 96.14% पास रेट, टॉपर रेशीदा नाज़ की कहानी और शिक्षा प्रणाली की चुनौतियाँ

झारखंड राज्य ने अपने इंटरमीडिएट (कक्षा‑12) के 2026 परिणाम जारी कर 96.14% का कुल पास प्रतिशत बताया। यह आंकड़ा मीडिया‑संकल्पित ‘शैक्षिक सफलता’ का प्रतीक बनता दिखाया गया, जबकि वास्तविक सीखने की गुणवत्ता की कोई जाँच नहीं हुई।

क्लास‑12 के विकल्प‑वार आंकड़ों में कला शाखा ने 98.23% पास दर के साथ सबसे अधिक सफलता हासिल की। विज्ञान और वाणिज्य के प्रतिशत क्रमशः 94.78% और 95.02% रहे। डबंग जिले की रेशीदा नाज़ ने 489 अंकों के साथ राज्य‑स्तर की टॉपर्स में शिर्ष स्थान प्राप्त किया, जिससे वह अपनी निजी कठिनाइयों से जूझते हुए कई विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन गई।

गु्मला, खुंटी और सिमडेगा जिलों ने पास प्रतिशत के हिसाब से शीर्ष‑तीन स्थान पर कब्ज़ा किया, जबकि पालामडु और पतरास जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में परिणाम अभी भी घटिया दिख रहे हैं। इस असमानता को सरकार ने ‘भौगोलिक विविधता’ का नाम देकर पृष्ठभूमि में धकेल दिया, जबकि मूलभूत संसाधन‑असमानता पर कोई ठोस उपाय नहीं बताया गया।

परिणामों को ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध कराना, डिजिटल सुविधा के राज को आगे बढ़ाने का एक कदम है; परंतु उस पोर्टल तक पहुँचने के लिए आवश्यक इंटरनेट कनेक्शन ही कई ग्रामीण स्कूलों में अभी भी ‘विचारधारा की कल्पना’ बनी हुई है। इस डिजिटल अंतर को शैक्षणिक सफलता के आँकड़े के साथ सराहना, प्रशासन की व्याख्या में एक दिलचस्प व्यंग्यात्मक विरोधाभास पेश करता है।

शिक्षा विभाग ने परिणाम घोषणा के साथ ही ‘उच्च पास दर’ को राज्य की शैक्षिक सुधार नीति की उपलब्धि बताया, परंतु शिक्षण‑सामग्री की अद्यतनता, शिक्षक प्रशिक्षण, स्कूल बुनियादी ढाँचा और परीक्षा‑परीक्षण की विश्वसनीयता पर चर्चा नहीं की। बहुसंख्यक छात्रों और उनके परिवारों के लिये यह परिणाम एक दोधारी तलवार बन गया—एक ओर पास होने का उत्सव, दूसरी ओर वास्तविक ज्ञान और कौशल के अभाव की अनदेखी।

समाज के बड़े वर्ग, विशेषकर पिछड़े समूह, जो राज्य की शिक्षा प्रणाली पर निर्भर हैं, उन्हें इस परिणाम से ‘सिर्फ अंक’ की खुशी मिलती है, जबकि रोजगार, विश्वविद्यालय प्रवेश और दीर्घकालिक सामाजिक गतिशीलता के प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं।

विस्तृत विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उच्च पास दर का जश्न मनाने से पहले शैक्षिक गुणवत्ता, समानता और नीति‑कार्यान्वयन की गहरी जाँच आवश्यक है। यदि सरकार वास्तव में ‘उच्च शिक्षा’ को जन-जन तक पहुँचाना चाहती है, तो वह न केवल प्रतिशत को बल्कि सीखने के सच्चे मानकों को भी मापने हेतु प्रणालीगत सुधारों को अपनाए।

Published: May 6, 2026