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Category: समाज

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जवाबदेहियों की झलक: सुरक्षित रिश्तों पर ज़ोर देने से बढ़ता युवा मानसिक संकट

वर्षों से सामाजिक व्यवस्था ने "समझदारी वाले प्यार" पर ज़ोर दिया है—व्याख्यानों में दृढ़ता, नीति दस्तावेज़ों में सुरक्षा वाक्यांश। पर नवीनतम राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि इस प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण के कारण 18‑24 वर्ष के युवा वर्ग में अवसाद और अकेलेपन की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

समाजशास्त्री मानते हैं कि जब रिश्तों को केवल "समझदारी" के रंग में लिपिटा जाता है, तो भावनात्मक जोखिम को नज़रअंदाज़ किया जाता है। परिणामस्वरूप मिलनसारिता के स्वाभाविक उतार‑चढ़ाव, प्रेम में मौलिक असुरक्षा, और जीवन में उत्साह की कमी सामने आती है। ऐसे माहौल में युवा लोग अक्सर अपने दिल की आवाज़ को दबा कर, सामाजिक मानदंडों के अनुरूप रहने की कोशिश में आत्म‑अस्थिरता का बोझ उठाते हैं।

इसी बहस के बीच केंद्र सरकार ने हाल ही में "सुरक्षित प्रेम अभियान" लॉन्च किया, जिसमें डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर "जिम्मेदार रिश्ते" पर जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। हालांकि, इस पहल में व्यावहारिक मदद की कमी स्पष्ट है—कौन सी थेरापी सुविधा, कौन से स्कूल पाठ्यक्रम में भावनात्मक शिक्षा, या किस प्रकार के ग्राउंड‑लेवल समर्थन को लागू किया जाएगा, इसकी कोई ठोस रूपरेखा नहीं दी गई।

शिक्षा विभाग ने कहा कि अब स्कूलों में मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की नियुक्ति अनिवार्य की जाएगी। परन्तु पिछले वर्ष के आंकड़े दर्शाते हैं कि केवल 12 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में पर्याप्त प्रमाणित काउंसलर हैं, जबकि बाकी 88 प्रतिशत में यह सेवा मात्र कागज़ी औपचारिकता बनी हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के जवाब में कहा गया कि मौजूदा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में "रिश्तों के स्वस्थ प्रबंधन" को एक विशिष्ट मोड्यूल के रूप में जोड़ने की प्रक्रिया चल रही है। फिर भी, कार्यक्रम का बजट पिछले दो वर्षों में स्थिर रहा, जिससे इस वादे को व्यावहारिक रूप में बदलना कठिन प्रतीत होता है।

समाज में मौजूदा असमानता इस मुद्दे को और जटिल बना देती है। उच्च वर्ग के युवा अक्सर निजी थेरापिस्ट और वैकल्पिक काउंसलिंग सेवा ले सकते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर होते हैं—जहां अक्सर काउंसलर की कमी और लंबी प्रतीक्षा अवधि प्रमुख बाधाएँ बन जाती हैं।

व्यापारियों और शहरी नगर नियोजन वालों ने संकेत किया है कि सार्वजनिक स्थानों में सामुदायिक कार्यक्रम, जैसे प्रेम और संबंधों पर कार्यशालाएं, युवाओं को आत्म‑अभिव्यक्ति के स्वस्थ मंच प्रदान कर सकते हैं। लेकिन इन सुझावों को भी प्रशासन ने अक्सर "भविष्य के कार्यसूची" में धकेल दिया, जिससे आम जनता को तत्काल राहत नहीं मिल पाती।

सारांश में कहा जाए तो, सुरक्षा के पर्चे पर प्रेम को सख़्ती से घेरने से युवा वर्ग की भावनात्मक जड़ता तो नहीं घटेगी, बल्कि उन्नत मानसिक समस्या के नए रूप उभरेंगे। नीति निर्माताओं को अपनी जाँच‑परख के साथ-साथ, भावनात्मक जोखिम को स्वाभाविक मानते हुए, उचित थेराप्यूटिक ढांचा, स्कूल‑आधारित भावनात्मक शिक्षा, और सुलभ सार्वजनिक काउंसलिंग सेवाओं का सुदृढ़ीकरण करना चाहिए। तभी हम यह कह पाएँगे कि प्रेम का चयन, चाहे समझदारी से हो या थोड़ी‑सी मूर्खता के साथ, वास्तव में जीवन को जीवंत बनाता है, न कि सिर्फ़ नीति दस्तावेज़ों की शुद्धता।

Published: May 7, 2026