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जंगल के शेर की परख: टाइगर को चुनौती देने वाले पाँच जीव और मानव‑वन्यजीव संघर्ष की नीति‑खामियाँ
भारत के कई वन्य क्षेत्रों में टाइगर को शिखर शिकारियों में गिना जाता है, पर वास्तविकता यह है कि बधिर जंगली तुमी, विशाल गौर, बड़ी पायथन, धोल समूह और यहाँ तक कि सिंह भी कभी‑कभी शेर के सामने सिर झुका देते हैं। इन जीवों के साथ टाइगर की लडाई सिर्फ प्रकृति की कथा नहीं, बल्कि ग्रामीण जनजीवन में प्रत्यक्ष संघर्ष का कारण बनती है।
पिछले छह महीनों में कर्नाटक के कर्नोल, उत्तराखंड के पुडुपात्रा, महाराष्ट्र के सातारा और पश्चिमी घाट के कुछ भागों में बुजुर्ग किसान, गौ-चालक और गॉर्ज वासी इन पाँच जीवों से जुड़े कई गंभीर घटनाओं की शिकायत कर रहे हैं। एक बधिर जंगली तुमी ने एक छोटे बाग़ में लगी धान की फसल को नज़रअंदाज़ नहीं किया – उसने कई कुटुंबों की आजीविका को धूमिल कर दिया। गौर – जो खुद में एक ही क़दम में पाँच भैंसों के बराबर वजन रखता है – फसल के किनारे कुचल कर फसल नुकसान का कारण बन रहा है, जबकि स्थानीय प्रशासन वचन देता रहता है, “हमारी योजना में जल्द ही जेल-ट्रेन की व्यवस्था होगी”।
गर्मियों में कई गाँवों में बड़ी पायथन के जाल में फँसे लोग उठे‑बैठे रहे; बचाव दल की प्रतिक्रिया अक्सर तब तक देर से आती है, जब तक पायथन ने अपना “ड्रेस‑कोड” बदल रखा हो। धोल के झुंड, जो अक्सर टाइगर के शिकार को रोकते हैं, अब बाड़े तोड़कर गाँव के घरों तक पहुँच रहे हैं, जिससे घर‑घर में सतर्कता का माहौल बन गया है। वहीं, गुजरात के रांच में सिंह की पुनः उपस्थिति ने पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर सुरक्षा उपायों को “सुपरविजन लेयर” तक सीमित कर दिया, जबकि स्थानीय लोग आग के धुएँ की तरह धधकते चिंताजनक प्रश्न उठाते हैं।
इन घटनाओं पर प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ अक्सर मानक फॉर्मूले पर टिकी रहती हैं: “घटनाओं की रिपोर्ट मिलते ही हम कार्रवाई करेंगे”, “परेशानियों के लिए क्षतिपूर्ति प्रक्रिया चल रही है”। वास्तविकता में कई ग्रामीण को महीनों‑सालों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जबकि उनका आरोग्य, शिक्षा और रोज़गार की संभावनाएँ क्षीण होती जाती हैं। वन विभाग की “वाइल्डलाइफ़ कॉन्वर्ज़न योजना” के तहत स्थापित कई सेंटर असंगठित हैं, और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की कमी के कारण बचाव कार्य में “एक ही दिशा में दो कदम आगे और एक कदम पीछे” की स्थिति बनी रहती है।
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल एक वन्य जीव‑टैग‑टैग के संघर्ष नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता का प्रतिविंब है। सतत जंगल‑आधारित जीवन वाले आदिवासी, दलित किसान और छोटे उधमी इन नीतियों के “तलवार‑तेज़ी” से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनकी बीमारी की देखरेख, बच्चों की स्कूल‑को-ट्रांसपोर्ट सुविधा और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ इन टकरावों के कारण प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती हैं।
कई सामाजिक संगठनों ने कहा है कि “एक ही जंगल में दो शेरों को एक साथ रहने देना असंभव है” – बशर्ते नीति‑निर्धारण में शिकारियों की भूमिका को केवल टाइगर तक सीमित न रखें। वन्य जीवों के बीच संतुलन बनाना, स्थानीय जनता के जीवन‑स्तर को बेहतर बनाना और वास्तविक समय की चेतावनी प्रणाली स्थापित करना प्रशासनिक उत्तरदायित्व को पूर्ण करने के आवश्यक कदम हैं। लेकिन वर्तमान “कागज़ी कार्यवाही” के साथ‑साथ “डिज़िटल डैशबोर्ड” तक भी नहीं पहुँच पाते, तो इन पाँच जीवों की टाइगर‑से‑टकराव की कहानी एक निराशा‑भरी सच्चाई ही बन कर रह जाएगी।
Published: May 7, 2026