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Category: समाज

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छोटे यार्ड में बागवानी: शहरी गरीबों की आशा या नीति‑निर्माण की खामोशी

आधुनिक महानगरों में रहने वाले कई परिवारों के पास केवल छोटा बालकनी या पतली आवासीय बाड़ ही बागवानी के लिए उपलब्ध है। बौना फलदार पेड़ – सेब, अंजीर, नींबू या लीची के संकर संस्करण – इस सीमित स्थान को भी फलों से भरने का दावा करते हैं। इस अवधारणा ने न केवल रसोई में ताज़ा उपज लाने का वादा किया है, बल्कि शारीरिक सक्रियता, मानसिक सुख‑शांति और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का भी संदेश दिया है।

हालाँकि, नीतियों के शब्दजाल और योजनाओं के कागज़ी तौर‑तरीकों को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन इस संभावित समाधान को केवल ‘भविष्य की योजना’ के रूप में रख कर परिप्रेक्ष्य से बाहर कर रहा है। राष्ट्रीय कृषि एवं किसान विकास योजना में शहरी बागवानी के लिए कोई स्पष्ट प्रवर्तन तंत्र नहीं दिया गया है, जबकि कई शहरों में सार्वजनिक भूमि का अपव्यय और जलनिकासी की खराब व्यवस्था जारी है।

शहरी गरीबों की स्थिति इस बात को उजागर करती है कि छोटे‑छोटे बागवानी के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ – पर्याप्त धूप, जल आपूर्ति, मिट्टी की गुणवत्ता, तथा कीट‑रोग नियंत्रण – अक्सर नगर निगम की अति‑व्यस्तता में खो रहती हैं। एक सामान्य मध्यम वर्गीय बालकनी में प्रतिदिन 30‑40 लिटर के जल की जरूरत होती है, जबकि कई वार्ड में जलपान के लिए स्थापित नल अभी भी सीवेज पाइपों के साथ गड़बड़ी में हैं। ऐसी स्थिति में बौना पेड़ का सफलपन केवल व्यक्तिगत प्रयोग तक सीमित रह जाता है।

सही नीतिगत दिशा‑निर्देशों के बिना, फल‑ए‑डौफ़ (फ्रूट‑एंड‑ऑरिएंटेड) परियोजनाएं अक्सर ‘खाली वादे’ बनकर रह जाती हैं। कुछ महानगर ने ‘रूफटॉप गार्डन’ पहल शुरू की है, परंतु उन परियोजनाओं के पारिस्थितिक मूल्यांकन, बीज/फसल की लागत पुनर्भुगतान, तथा कानूनी सुरक्षा के अभाव में भागीदारी के आँकड़े निराशाजनक रह रहे हैं। यह प्रश्न उठता है कि यदि शहरी नियोजन में ‘हर घर में एक पेड़’ का लक्ष्य है, तो इस लक्ष्य के लिये कौन सी संस्थागत ज़िम्मेदारी तय की गई है?

समाधान के रूप में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि स्थानीय निकायें छोटे‑छोटे बागवानी किटों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराएँ, जल‑बचत के लिए ड्रिप‑इरिगेशन को अनिवार्य करें, और सामुदायिक बागवानी केंद्रों को वार्षिक बजट में शामिल करें। साथ ही, शहरी बीज बैंक, स्कूल‑से‑बगीचा कार्यक्रम, तथा महिलाओं के सशक्तिकरण के तहत फल‑वृक्ष वितरण को प्राथमिकता देना आवश्यक है। इन उपायों को अनदेखा करने से केवल शहरी असमानता ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि ‘स्वस्थ भोजन’ के अधिकार को भी अत्यधिक रूढ़ियों में सीमित किया जाएगा।

सारांशतः, बौना फलदार पेड़ शहरी घरों में पोषण‑सुरक्षा की संभावनाओं को चित्रित तो करते हैं, परन्तु इस संभावना को साकार करने के लिये नीति‑निर्माताओं, नगरपालिका अधिकारियों और नागरिक समाज के बीच ठोस सहयोग की आवश्यकता है। अभाव की चुप्पी को तोड़ना, ढांचा‑निर्माण को तेज़ करना, एवं ठोस जवाबदेहियों को स्थापित करना ही वह ‘हरा‑लीला’ बन सकता है, जो सड़कों के किनारे के मलबे से अधिक फलदायक भविष्य का वादा करता हो।

Published: May 7, 2026