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घरेलू चूहों से हांटा वायरस: भय या तथ्य?
पिछले हफ़्ते कोरोना‑जैसे रोगों से जूझते भारत में एक नया सवाल उठाया गया – क्या घर‑परिवार में पाये जाने वाले सामान्य चूहे हांटा वायरस (Hantavirus) का स्रोत बन सकते हैं? विशेषज्ञों ने स्पष्ट कर दिया कि यह वायरस मुख्य रूप से जंगली गिलहरी के चूहों (Deer mice) और फील्ड माउस (Field mice) के मल, पेशाब, लार या घोंसले की सामग्री से फैलता है। इन प्रजातियों की मौजूदगी भारतीय ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में दर्ज की गई है, परन्तु शहरी घरों में पाये जाने वाले छोटे, धूसर‑रंग के चूहों को ‘गंभीर हांटा वायरस’ के जोखिम में कम माना जाता है।
हांटा वायरस का प्रसार भारत में अब तक अत्यंत विरल रहा है; राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल पर केवल कुछ ही पुष्टि‑की‑गई घटनाएँ दर्ज हैं। फिर भी इस रोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता। विषाणु से संक्रमित श्वसन तंत्र में गंभीर संक्रमण, हेमोफिलिया और कभी‑कभी मौत तक हो सकती है। इसलिए यह सवाल उठता है कि प्रशासनिक जवाबदेही कहाँ तक विस्तारित है, जबकि ग्रामीण इलाकों में धान के भण्डारण घरों, बाग‑बगीचों और अनजाने में घोंसले बनाने वाले चूहों के संपर्क में रहने की संभावना अधिक है।
वर्तमान में स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोई विशेष प्रोटोकॉल जारी नहीं किया है, न ही ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में इस रोग की सतत निगरानी के लिये विशेष बजट आवंटित किया गया है। सिर्फ ‘सफ़ाई और कचरा प्रबंधन’ के सामान्य दिशानिर्देशों में चूहों के प्रकोप को रोकने का उल्लेख किया गया है, जो कि व्यावहारिक रूप से अधूरा ठहरता है। कई नगर निगमों के सफाई विभाग अपने काम‑के‑लोड से बँधे हुए हैं, और अक्सर कचरा‑डम्पिंग साइटों पर चूहों की बढ़ती जनसंख्या को ‘स्वाभाविक’ समझकर अनदेखा कर देते हैं। यह वही ‘व्यायामशाला’ है जहाँ नीतियों की कसरत तो होती है, पर कार्यान्वयन की कोई दौड़ नहीं दिखती।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से दो पहलू स्पष्ट हैं: पहला, जागरूकता – ग्रामीण स्कूलों, महा‑ग्राव्य क्षेत्रों और कम प्रौद्योगिकीय सुविधाओं वाले कस्बों में हांटा वायरस के बारे में जानकारी बहुत कम है। दूसरा, रोकथाम – कचरा प्रबंधन, अनिवार्य धान‑भण्डारण को सील करना, और मौसमी रॉडेंट‑कंट्रोल कार्यक्रमों को सख़्ती से लागू करना। इन बिन्दुओं पर शहरी प्रशासन का ‘स्थिर‑विचार’ अक्सर ग्रामीण वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
अंत में यह कहा जा सकता है कि घर‑परिवार में पाये जाने वाले सामान्य चूहे ‘भले ही’ हांटा वायरस के प्रमुख वाहक न हों, पर उनका अनियंत्रित प्रकोप स्वच्छता‑सेवा की खामियों को उजागर करता है। यदि नीति‑निर्माता यह मान कर चलें कि ‘खतरा नगण्य है’, तो वह न केवल वैज्ञानिक साक्ष्य का अनादर है, बल्कि संभावित भविष्य में रोग‑फ्लैशबैक की तैयारी में भी लापरवाही बरत रहे हैं। केवल तब जब प्रशासन स्वच्छता, निगरानी और जनजागरूकता के संगम पर ठोस कदम उठाएगा, तब ही इस रोग को सार्वजनिक स्वास्थ्य के ‘रहस्य’ से ‘वास्तविक चुनौती’ में बदलने से रोका जा सकेगा।
Published: May 9, 2026