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Category: समाज

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घर में बनती थाई आइस्ड चाय: स्वास्थ्य‑संबंधी जोखिम और शासन की लापरवाह नीति

सामाजिक नेटवर्क पर थाई आइस्ड चाय की चमकीली तस्वीरें और कैफ़े‑स्टाइल रेसिपी आजकल घर‑घर में गूँज रही हैं। झागदार क्रीम, काली चाय, कंडेन्स्ड मिल्क और मोटी मात्रा में शक्कर को मिलाकर बनाई जाने वाली यह पेय सामग्री के आयात‑निर्यात के आँकड़े भी नहीं, बल्कि भारत के मधुमेह‑ग्रस्त जनसंख्या के लिए एक नई चुनौती बन गई है।

आँकड़े यथार्थ दिखाते हैं कि घर में तैयार की जाने वाली इस पेय का शुगर कंटेंट सामान्य ग्रीन टी या काफी की तुलना में दोगुना या उससे अधिक हो सकता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में, नियमित सेवन से मोटापा, बीटा‑सेल डिसफ़ंक्शन और रक्तशर्करा में अनियमितताएँ उभर रही हैं। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब कंडेन्स्ड मिल्क जैसी उच्च‑फैट सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे कुल कैलोरी मात्रा बढ़ जाती है।

समाज के कई हिस्सों में यह पेय एक ‘स्टेटस सिम्बल’ बन चुका है, जहाँ बजट सीमित होते हुए भी लोग आयातित चाय पत्ती, विशेष ब्रांड की कंडेन्स्ड मिल्क और विदेशी स्पाइस की खोज में बड़े खर्च कर देते हैं। इससे न केवल घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, बल्कि काली बाजार में किफायती विकल्पों की अधिकता भी देखी गई है, जहाँ कम गुणवत्ता वाले सामग्रियों के साथ मिलाकर शुगर की मात्रा को और बढ़ा दिया जाता है।

ऐसे सामाजिक परिदृश्य के सामने प्रशासनिक झुकाव नज़र आता है। शुगर लेबलिंग, न्यूनतम शर्करा सीमा या टैक्स जैसी नीतियाँसिर्फ तैयार‑पैकेज्ड बेवरेजेज़ पर लागू होती हैं, जबकि घर में बनायी गई पेय पदार्थों को अनदेखा किया जाता है। ऐसी नीति‑खाई का फायदा उठाते हुए नियोक्ता और कैफ़े‑आधारित उद्योगों ने लक्षणात्मक टैक्स को तोड़‑फोड़ कर, वैकल्पिक रूप में उत्पाद को ‘हाउसस्पेस’ का दावा करके पेश किया। सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक बयानों में केवल कैंसर‑रहित तरल पदार्थों की सलाह दी जाती है, जबकि शुगर‑हाई ड्रिंक की वृद्धि को ‘ट्रेंडी लाइफ़स्टाइल’ के रूप में चित्रित किया जाता है। वास्तव में, इस अज्ञानता की सड़्य पंक्ति में यह कहा जा सकता है कि प्रशासन ने शुगर को बढ़ावा देने में महारत हासिल कर ली है।

इस व्यावहारिक असमानता को दूर करने के लिए नीति‑निर्माताओं को न केवल मौजूदा शुगर टैक्स को घर‑निर्मित पेय पदार्थों तक विस्तारित करना चाहिए, बल्कि स्कूल‑कैंटीन में स्वास्थ्य शिक्षा को सुदृढ़ करना, छोटे‑स्थानीय दुकानों में सॉलिड लाबेलिंग अनिवार्य करना और सार्वजनिक सूचना अभियानों के माध्यम से जंक फ़ूड‑ड्रिंक के दुष्प्रभावों को उजागर करना आवश्यक है।

वर्तमान में, जनता को स्वयं ही इस मीठे आकर्षण के पीछे छिपे स्वास्थ्य‑जोखिमों की पहचान करनी पड़ेगी, जबकि प्रशासन को भी अपनी नीति‑निर्धारण में नरमी से काम लेते हुए ‘स्वस्थ पेय’ की नई परिभाषा स्थापित करनी होगी। तभी इस ट्रेंडी थाई आइस्ड चाय के मीठे स्वाद के साथ साथ स्वस्थ भविष्य भी सम्भव होगा।

Published: May 9, 2026