घरों में छुपे साँप: स्वास्थ्य‑सुरक्षा की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही
साँप, अपनी चुप‑चापी और अचानक प्रकट होने वाली शारीरिक कमज़ोरियों के कारण, भारत के कई ग्रामीण‑शहरी क्षेत्रों में घर‑परिवारों के लिए भय का स्रोत बन चुके हैं। गर्मियों की लहर और बरसात की आर्द्रता के दौरान ये जीव ठंड, भोजन या छाने की तलाश में आवासीय काँटा‑कूटों में घुसपैठ कर लेते हैं। इस नज़रअंदाज़ी का असर विशेष रूप से सस्ते आवास, क़स्बों तथा झुग्गियों में रहने वाले वर्ग पर पड़ता है।
वर्तमान में भारत में 60 से अधिक साँप प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें 12 विषैला प्रजाति, जैसे कूर्पित रैटल स्नेक और बटेर साँप, प्रमुख रूप से मानव‑संपर्क में आती हैं। विषैला साँप का काटना केवल चोट नहीं, बल्कि स्वास्थ्य‑सुरक्षा प्रणाली पर बोझ बन जाता है—विषाक्तता के कारण शीघ्र उपचार न मिलने पर मृत्यु या दीर्घकालिक विकलांगता का जोखिम बढ़ जाता है।
साँपों के संभावित छिपने के स्थानों की पहचान करते हुए, सामाजिक मंचों और स्थानीय शिकायत पंजीकों ने निम्नलिखित बिंदुओं को उजागर किया है:
- अप्राकृतिक रूप से जमी हुई बर्तन‑घर और बिन पानी वाली टंकी; छिपने के लिए ठंडक का स्रोत।
- गंदे बगीचे, बेमेल ढेर, पुराने लकड़ी के ढेर – जहाँ पर कीड़े‑मकौड़े भी पनपते हैं, जो साँपों के भोजन बनते हैं।
- कुहाड़े, नींद‑कमरों के किनारे खुले दरवाज़े, जहाँ से साँप छोटे-से‑छोटे दरारों से प्रवेश कर सकते हैं।
- बाजार‑संकुल की अल्पसंख्यक गलियों में जमा कचरा; अक्सर यह पहली बार निरीक्षण में नज़र नहीं आता।
- पुराने जलाशयों, ड्रेनेज पाइप और सीवर‑हाउस के अंदर, जहाँ नमी बनी रहती है।
इन स्थानों की उपेक्षा सिर्फ निजी सुरक्षा को नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी गंभीर जोखिम में डालती है। कई मामलों में, स्थानीय प्रशासन द्वारा समय पर कीट‑नियंत्रण या शहरी सफाई के उपाय लागू नहीं किए गए, जिससे समस्याएँ ख़ुद‑ब-ख़ुद बढ़ती गईं। फिर भी, जब मार्मिक घटनाएँ—जैसे विस्फोटक विषाक्तता या साँप काटने से अस्पताल में भर्ती—होती हैं, तो जिम्मेदारी के लिये आश्रित विभागों पर ‘आख़िरी घड़ी में’ प्रतिक्रिया देखी जाती है।
यहाँ तक कि वन्यजीव विभाग की टॉप‑लेवल नोटिसें भी अक्सर ‘स्वच्छता‑सुरक्षा’ के शब्दकोश में ढँक जाती हैं, जबकि स्थानीय निकायों की बजट‑निर्धारण में शहरी सफाई और किट‑नियंत्रण को प्राथमिकता नहीं दी जाती। सतही तौर पर आयोजित किए जाने वाले ‘जनजागृति अभियान’ अक्सर केवल सूचना‑पत्रक और सोशल‑मीडिया पोस्ट तक सीमित रह जाते हैं, जबकि मिट्टी‑की गली में छिपे साँपों को हटाने के ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
सामाजिक असमानता का इस सुरक्षा‑बाधा में प्रकट होना भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लिंग, आय‑समूह और सामाजिक वर्ग के आधार पर जोखिम में अंतर बरकरार रहता है। महिलाएँ, बुजुर्ग और छोटे बच्चे—जिनके पास जल्दी से सुरक्षित स्थान तक पहुँचने की क्षमता नहीं होती—सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनका स्वास्थ्य‑निहित जोखिम न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामुदायिक स्तर पर भी बढ़ जाता है।
इन चुनौतियों के समाधान के लिये नीति‑निर्माताओं को तत्काल दो‑स्तरीय कदम उठाने की जरूरत है: (i) शहरी नियोजन में जल निकासी, कचरा प्रबंधन और आवासीय निर्माण मानकों को सख़्ती से लागू करना, तथा (ii) वन्यजीव विभाग और स्थानीय निकायों के बीच प्रभावी सामंजस्य स्थापित कर, नियमित साँप‑नियंत्रण अभियानों को संसाधन‑सहित लागू करना। केवल तब ही यह मानवीय‑सुरक्षा‑परिपक्वता की कसौटी पर खरा उतरेंगे, जहाँ प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि सक्रिय प्रबंधन को सराहा जाएगा।
Published: May 5, 2026