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Category: समाज

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घर के बगीचे में ब्लैक मैम्बा: जनता की अनभिज्ञता और प्रशासनिक लापरवाही

पिछले कुछ हफ्तों में उत्तर-पूर्वी भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में ब्लैक मैम्बा जैसी विषैली साँपों के नजरें लगने की खबरें बढ़ी हैं। यद्यपि ये विषकारक साप मूलतः अफ्रीका के मूल निवासी हैं, आयातित पौधों, कंटेनरों या अनजाने में लादे गए सामान के माध्यम से भारतीय उपजत्र में पहुँचा है। ऐसा होने पर ग्रामीण घरों और शहरी बगीचों में साधारण नागरिक अक्सर घातक भ्रम में फँस जाते हैं, जबकि कई बार बेगांठ भरी निरक्षरता ही असली खतरा बन जाती है।

विष विषैला होने के साथ-साथ ब्लैक मैम्बा अपनी तेज गति और सतर्क व्यवहार के लिए जाना जाता है। इसकी काली रंगत और पतली शरीर संरचना अक्सर स्थानीय दुर्भिक्ष साँपों के साथ ग़लत समझी जाती है, जिससे सामान्यतः शांत रहने वाले जीव भी साहसिक कदम उठाते हैं। इस भ्रम का सीधा असर जनता के स्वास्थ्य पर पड़ता है: अनावश्यक पैनिक, गलत उपचार, और देर से अस्पताल पहुँचने की स्थिति पैदा हो जाती है।

ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग की तत्परता को देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अनेक राज्यों में एंटीवेनम की उपलब्धता अत्यधिक सीमित है, और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को विष विषैला साँप के मामलों को संभालने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। कई बार पीड़ित को दूरी तय कर बड़े शहर के अस्पताल पहुंचाने में अतिरिक्त दो‑तीन दिन लगते हैं, जो एंटीवेनम के प्रभाव को घटा देता है।

सभी यह प्रश्न उठता है कि ऐसी स्पष्ट खतरनाक स्थिति में प्रशासन ने कौन सी निवारक कदम उठाए हैं? स्थानीय पब्लिक वर्क्स विभाग ने अभी तक साप प्रतिरोधी बागवानी प्रथाओं का विस्तार नहीं किया है, जबकि कृषि विभाग ने सांप-प्रबंधन के लिए विशेष योजना प्रस्तुत करने का वादा किया था, पर वह अभी तक कागज पर ही मौजूद है। जलस्रोतों के पास कचरे की लापरवाह निपटान, वन्यजीवों का वस्तुनिष्ठ निपटान, और अनादरयुक्त निर्माण कार्य इन साँपों को घरों के निकट रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

समाधान की दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत मिलते हैं: कुछ ज़िलों ने मोबाइल एप‑आधारित त्वरित रिपोर्टिंग प्रणाली स्थापित की है, जिससे नागरिक तुरंत पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को सूचना दे सकते हैं। फिर भी, ये तकनीकी उपाय तभी कारगर हैं जब बुनियादी जनजागरूकता स्तर पर्याप्त हो। ग़ैर‑विशेषज्ञों को व्यावहारिक पहचान गाइड, फोटो‑संचालन और पहली‑उपचार के प्रोटोकॉल उपलब्ध कराना अनिवार्य हो जाना चाहिए।

जैसे‑जैसे शहरीकरण और औद्योगीकरण बढ़ रहा है, वन्यजीवों का मानवीय परिवेश से टकराव अनिवार्य हो रहा है। इस दुविधा को केवल नागरिकों की चेतावनी तक सीमित नहीं किया जा सकता; यह नीति‑निर्माण, स्वास्थ्य‑इन्फ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय प्रबंधन के समन्वित प्रयास की मांग करता है। प्रशासन की लापरवाही को अब व्यंग्य के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के अभाव के रूप में स्वीकार करना आवश्यक है, तभी भविष्य में ब्लैक मैम्बा जैसी विष-भरी घटनाओं को वास्तविक खतरे की बजाय अभिप्रेरित चेतावनी बनाकर रखा जा सकता है।

Published: May 9, 2026