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गिलहरी से बागों में तबाही: सस्ते पुदीने के उपाय पर प्रशासन की अनदेखी
शहर के मध्यवर्ती कॉलोनी और झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में छोटे‑छोटे बागों को गिलहरी द्वारा लगातार नुकसान झेलना पड़ता है। इन सर्दियों में जहाँ घर की रसोई में सब्ज़ियों की कमी महसूस होती है, वहीं गिलहरी के कूदते‑कूदते पौधों की पत्तियों को चबाने का शोर भी सुनाई देता है।
पर्यावरणीय अध्ययन के अनुसार, गिलहरी सिर्फ सर्दियों में ही नहीं, बल्कि शहर के हर मौसम में धान, धूप, टमाटर जैसी फ़सलों को नशीली मादकता की तरह चाबती है। इस नुकसान का बोझ मुख्यतः उन परिवारों पर पड़ता है, जो स्वयं की खेती पर पोषण का भरोसा रखते हैं और जिनकी आर्थिक स्थिति सीमित है।
वहीं, नगरपालिका और स्थानीय प्रशासन ने इस मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर दिया है। न तो कोई विशेष पेस्टिसाइड प्रावधान है, न ही कोई सामुदायिक खेती‑सुरक्षा योजना। अक्सर यह कहा जाता है कि “पशु संरक्षण कानून” के कारण कार्रवाई संभव नहीं, पर वास्तविकता में वे इस बाधा को एक आलस‑भरे बहाने में बदलकर अपने अतिक्रमण के काम को टालते हैं।
ऐसे में शहरी निवासियों को खुद ही समाधान ढूँढ़ना पड़ता है। विकल्पों की तलाश में कई लोगों ने पुदीना, विशेषकर पिपरमिंट की तीव्र महक को प्राकृतिक हतोत्साहन के रूप में अपनाया है। पुदीना आसानी से गमले में उगता है, कम पानी की जरूरत होती है और इसकी खेती से घर में ही हरे‑भरे स्वाद का आनंद मिलता है।
स्थानीय स्वयंसेवक समूहों ने एक साधारण DIY स्प्रे तैयार किया है: दो कप पानी, एक चम्मच पिपरमिंट तेल और थोड़ा साबुन मिलाकर बोतल में डालें, फिर पौधों की जड़ों और पत्तियों पर छिड़कें। इस मिश्रण की तेज़ सुगंध गिलहरी को असहज बनाकर दूर रखती है, जबकि पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाती। इस उपाय को अपनाने के लिए महंगे रसायनों या व्यावसायिक सेवाओं पर निर्भर होने की जरूरत नहीं रहती।
परंतु इस ‘सस्ते समाधान’ को केवल व्यक्तिगत प्रयोग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शासन को चाहिए कि वह शहरी वन्यजीव प्रबंधन के लिए स्पष्ट नीति बनाये, स्थानीय निकायों को हाइड्रॉपोनिक बाग़ों में पुदीना जैसी प्रतिरोधी जड़ी‑बूटियों की खेती के लिए प्रोत्साहन दे और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता अभियानों को व्यवस्थित करे। अन्यथा, वही पुरानी लुप्त‑होती आदतें—आलोचनात्मक प्रश्नों को नज़रअंदाज़ करना—फिर से दोहराई जाएँगी।
जैसे ही गिलहरी की महकीली चालों को पुदीने की सुगंध में बदलने की जरूरत है, वैसे ही प्रशासनिक अटकलबाज़ी को भी ताज़ा सोच की हिलोर में बदलना अनिवार्य है। तभी शहरी बाग़ों की हरियाली और गरीब家庭 की पोषण सुरक्षा दोनों को वास्तव में सुनिश्चित किया जा सकेगा।
Published: May 7, 2026