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Category: समाज

ग्लास‑होल्डिंग टेस्ट के झूठे दावे, उपभोक्ता भ्रम और नियामक चुप्पी

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर बिखरे व्यक्तिगत गुणों के परीक्षणों में अब औपचारिक प्रश्नावली की जगह छोटे‑छोटे व्यवहारों को ‘जानकार दिखाने’ का आह्वान किया जा रहा है। सबसे नया रुझान—ग्लास‑होल्डिंग टेस्ट—यह दावा करता है कि आपकी मुसलाधार या सपाट पकड़ से आपके स्वभाव की छुपी हुई झलक मिलती है। कोई वैज्ञानिक आधार नहीं, फिर भी सोशल‑मीडिया पर यह टेस्ट ‘मज़ेदार आत्म‑परिचय’ के रूप में लाखों को आकर्षित कर रहा है।

ऐसे परीक्षणों का सामाजिक दायरा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रह गया। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अति‑सावधानी की कमी, आत्म‑समर्थन की आवश्यकता और साइबर‑साक्षरता की गिरावट ने इस प्रकार के अफ़वाओं को fertile ground बना दिया है। असुरक्षित वर्ग—जिनकी शिक्षा, आय या डिजिटल जागरूकता सीमित है—इन साधारण संकेतों पर अपने निर्णय ले सकते हैं, जिससे पहले‑पहले व्यक्तिगत या पेशेवर चुनौतियों का अनुचित विश्लेषण हो सकता है।

यहाँ तक कि कुछ छोटे‑बड़े शैक्षणिक संस्थान और निजी स्वास्थ्य फ़र्में भी इन ‘ट्रेंड’ को अपने कार्यशालाओं और पब्लिक‑स्पीकिंग कार्यक्रमों में शामिल कर रही हैं, जिससे दिंर्घकालिक पद्धतिगत प्रभाव का जोखिम बढ़ता है। एक ओर जहाँ साक्षरता अभियान के तहत ‘सही जानकारी’ को बढ़ावा देना चाहिए, वहीं दूसरी ओर ऐसे बेमेल कंटेंट को बिना जांचे‑परखे प्रसारित किया जा रहा है।

न्यूनतम सरकारी प्रतिक्रिया भी इस परती को समझने के लिये पर्याप्त नहीं रही। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण विभाग ने तकरीबन कोई विशेष दिशानिर्देश जारी नहीं किए, जबकि विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) का प्रावधान केवल ‘भ्रामक विज्ञापन’ की सीमा में ही रहता है—जिसकी परिभाषा अस्पष्ट है और प्रवर्तन में अक्सर देरी होती है। परिणामस्वरूप, जनता को स्वयं ही ‘ग्लास‑गाइड’ की तलाश करनी पड़ती है, जबकि नियामक केवल फिरकी लेते रहते हैं।

व्यवहारिक समाधान स्पष्ट है: वैध वैज्ञानिक डेटा पर आधारित मानसिक‑स्वास्थ्य परीक्षणों को प्राथमिकता देना, सामाजिक मीडिया पर झूठे आत्म‑विचार को रोकने के लिये सख्त नियम बनाना, और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिये स्कूल‑स्तर के पाठ्यक्रम में मीडिया‑लिटरेसी को अनिवार्य करना। सार्वजनिक जवाबदेही तभी पूरी होगी, जब नीति‑निर्माताओं और नियामकों द्वारा ‘छोटे‑छोटे संकेत’ के रहस्य को सच्ची जांच के दायरे में लाया जाए, न कि इसे अंधविश्वास की तरह ही रह दिया जाए।

Published: May 5, 2026