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ग्रेन में छोटे छिद्रों ने बिखेरी ताजगी, लेकिन नीति में अभी भी छेद
अंगूर, जैसा कि विज्ञान बताता है, कटाई के बाद भी श्वसन जारी रखता है और अपने भीतर नमी जमा करता है। यह नमी अगर बाहर नहीं निकली तो शीघ्र ही फफूँदी और बैक्टीरिया का घर बन जाता है। पैकेजिंग में छोटे-छोटे छिद्र, जिन्हें माइक्रो‑परफोरेशन कहा जाता है, इस अतिरिक्त नमी को बाहर निकलने का मार्ग प्रदान करते हैं, जिससे फल सख़्त, ताज़ा और रोग‑रहित रहता है।
भारत में अधिकांश किराना स्टॉल और सुपरमार्केट अभी भी पारदर्शी या धूमिल प्लास्टिक बैग का प्रयोग करते हैं, जिसमें हवा का निकास सीमित होता है। परिणामस्वरूप अंगूर जल्दी ही गीला‑गंदा हो जाता है, फफूँदी लगती है और उपभोक्ताओं को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। गरीब वर्ग के लिए यह केवल आर्थिक बोझ नहीं, बल्कि स्वास्थ्य‑संकट भी बन जाता है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में ताज़ा फलों‑सब्जियों की पैकेजिंग के लिये माइक्रो‑परफोरेटेड बैग को अनिवार्य करने की दिशा में ड्राफ्ट नियम जारी किए हैं। परंतु राज्यों में इस दिशा‑निर्देश के कार्यान्वयन में बाधाएँ दिख रही हैं। कई निरीक्षण इकाइयाँ पैकेजिंग के प्रकार को लेकर अनजान या उदासीन रहती हैं, जिससे नियम‑कानून कागज़ पर ही रह जाते हैं। यह स्थिति नीति‑कार्यान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच के अंतराल को स्पष्ट करती है।
उपभोक्ता जागरूकता की कमी भी इसी समस्या का एक बड़ा कारण है। बाजार में “वेंटिलेटेड पैकेज” शब्द अक्सर छुपे हुए विज्ञापन की तरह दिखाई देता है, जबकि वास्तविक उत्पाद में वही पुरानी, नॉन‑परफोरेटेड बैग रहती है। यदि नियामक संस्थाएँ लेबलिंग को अनिवार्य कर दें और बाजार में ऐसे उत्पादों को सस्ती दरों पर उपलब्ध कराए, तो न केवल खाद्य बर्बादी घटेगी, बल्कि सस्ते दामों पर स्वस्थ फल‑सब्जियों की पहुंच भी सुनिश्चित होगी।
सारांश में कहा जाए तो छोटे‑छोटे छिद्रों ने अंगूर की शेल्फ‑लाइफ़ को बढ़ाया है, पर प्रशासनिक लापरवाही ने इस वैज्ञानिक प्रगतिशीलता को आम जनता तक पहुँचाने में बाधा खड़ी कर रखी है। समय आया है कि नियामक, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच संवाद स्थापित हो, ताकि पैकेजिंग के इस ‘छेद’ को न केवल फल‑फूल का मार्ग बनाकर, बल्कि भारत की खाद्य सुरक्षा का भरोसा भी बनाकर समाप्त किया जा सके।
Published: May 7, 2026