गाज़ा में पत्रकारों की याद में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस: मौतों की बढ़ती गिनती, भारत में मीडिया सुरक्षा की दोहरी चुनौती
गाज़ा में इस वर्ष विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस को उन सहकर्मियों को श्रद्धांजलि देता हुआ मनाया गया, जो इज़राइली सैन्य अभियानों के दौरान गोलीबारी, ध्वस्त और हवाई हमलों के शिकार बनकर अपनी जान गंवा चूके हैं। स्थानीय पत्रकार संघों ने मृतकों की सूची प्रकाशित की, जिसमें इस महीने में ही कम से कम दो नए नाम शामिल हुए। इस प्रकार, पत्रकारों की मृत्यु‑दर में लगातार इजाफ़ा हो रहा है, जिससे वैश्विक स्तर पर संघर्ष‑क्षेत्र में पत्रकार सुरक्षा की नौबत फिर से उजागर होती है।
भारत में इस अवसर पर प्रेस कॉऊंसिल और कई नागरिक समाज संगठनों ने मौन नहीं तोड़ा। उन्होंने ‘अखबार और टेलीविजन को शत्रु के गोले से बचाना’ का प्रतिज्ञा‑पत्र जारी किया और सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा को नीतिगत स्तर पर सुदृढ़ करने की मांग की। लेकिन मौजूदा समय में, सरकार के बयानों में अक्सर शैली‑परिवर्तित ‘जज़्बा’ और ‘समानता’ के शब्द घुसे होते हैं, जबकि ठोस उपायों की कमी कुख्यात है।
सुरक्षा के मुद्दे स्वास्थ्य के साथ भी घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। युद्ध‑क्षण में घायलों को तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिलना अक्सर असंभव हो जाता है; कई पत्रकारों को गंभीर तनाव‑दर्द, श्वसन‑और श्रवण समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जबकि उनका मानसिक स्वास्थ्य पर असर कई सालों तक बना रहता है। भारत के कई पत्रकार प्रशिक्षण संस्थानों में इन जोखिमों को ध्यान में रखते हुए कोई विशेष पाठ्यक्रम नहीं है, जिससे भारत‑निर्मित पत्रकार वर्ग में असमानता की खाई और गहरी हो रही है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया के संदर्भ में, दिल्ली में कई मंत्रालयों ने ‘स्मारक’ बनाने, ‘सम्मान समारोह’ आयोजित करने और ‘नवीनतम तकनीकी गियर’ की घोषणा करने का अल्पसंख्यक कदम उठाया है। विडंबना यह है कि इन घोषणाओं के साथ ही आधे साल बाद ही उन सरकारी दस्तावेज़ों में ‘सुरक्षा प्रोटोकॉल’ का अंतिम संस्करण तैयार होते‑होते देखा गया, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नीति‑निर्माण की गति अक्सर इंटर्नेट‑सर्च से भी धीमी होती है।
पब्लिक हित के नजरिए से, एक स्वतंत्र और सुरक्षित प्रेस लोकतंत्र का मूलस्तंभ है। जब पत्रकारों को मारने या धमकाने की खबरें लगातार आती रहती हैं, तो न केवल सूचना का प्रवाह बाधित होता है, बल्कि नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान के लिए आवश्यक चेतावनी‑संदेश भी धुंधले पड़ते हैं। यह चुप्पी निस्संदेह सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती है, क्योंकि पहले‑से ही हाशिए पर रहने वाले क्षेत्रों में सूचना का अभाव उनकी मौजूदा दुविधाओं को और अधिक जटिल बनाता है।
आगे के परिणाम स्पष्ट हैं: यदि सरकार केवल औपचारिक स्मरण‑समारोहों तक सीमित रहती है और वास्तविक सुरक्षा ढाँचे, स्वास्थ्य‑सेवा पहुँच और पत्रकारों के कल्याण के लिए व्यावहारिक कदम नहीं उठाती, तो यह आजीवन लोकतांत्रिक अधिग्रहण का जोखिम बन जाएगा। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस को केवल ‘शोक’ नहीं, बल्कि ‘कार्रवाई’ का आदेश बनना चाहिए—सिर्फ गाज़ा में नहीं, बल्कि भारत की हर newsroom में।
Published: May 4, 2026