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गाज़ा में ध्वस्त परिवार की हताहतियों का साल‑डेढ़ बाद भी अनसुलझा दर्द
इज़राइल द्वारा गाज़ा पर किए गए उस एक्स्ट्रा‑डायनमिक हवा के हमले ने न केवल इमारतों को ध्वस्त किया, बल्कि एक विस्तारित परिवार को पूरी तरह नष्ट कर दिया। तब से बीते डेढ़ साल में शहरी बुनियादी ढांचे की क्षति, स्वास्थ्य सेवाओं की अभाव और अनिवार्य मानवीय सहायता की धीमी गति ने शहीदों की पहचान—अस्थियों—को खोजने को एक बोझिल कार्य बना दिया।
जीवन‑धारा के नैदानिक दायरे में यह एक तीखा प्रश्न खड़ा करता है: जब तक बची हुई परिजनों को अपने मृतकों के कंकालों को खोजने के लिए वर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तब तक स्वास्थ्य‑ट्रॉमा, मानसिक दवाब और सामाजिक पुनर्वास की क्षमता कितनी घट जाती है? इस त्रुटि में केवल युद्ध‑घूर्णी ही नहीं, बल्कि अस्थायी प्रशासनिक ढाँचे भी शामिल हैं, जो आपदा‑प्रबंधन के मानक को कभी पूरी तरह लागू नहीं कर पाते।
स्थानीय अधिकारियों के पास उचित बचाव‑संधान इकाइयाँ, आधुनिक ढहाव‑संकल्पना उपकरण और पुनःस्थापना के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल नहीं थे। परिणामस्वरूप, मलबे में दफन रहे कई मृतकों की हड्डियाँ आज भी घर‑परिघ के घर‑परिवार के पास के गड्ढों में पाई जा रही हैं। यह न केवल मृतकों के सम्मान में कमी को दर्शाता है, बल्कि विस्थापित लोगों के पुनर्स्थापना के अधिकार का भी उल्लंघन है।
भारत में भी जब प्राकृतिक आपदाओं या शहर‑भारी दुर्घटनाओं की बात आती है, तो अक्सर समान ही अक्षमताएँ सामने आती हैं—आधारभूत ढाँचे की कमी, त्वरित निचोड़‑उपाय की अनुपस्थिति, तथा वंचित वर्गों के लिए विशेष राहत योजना का अभाव। गाज़ा में इस त्रासदी ने अंतरराष्ट्रीय मानवीय मंच पर नज़रें फिर से इस दिशा में मोड़ दी हैं कि कैसे नीति‑निर्माताओं को त्वरित, पारदर्शी और जवाबदेह उपायों को लागू करना चाहिए।
जब तक राहत‑संकाय, स्वास्थ्य‑सेवा और पुनःस्थापना के लिए एकीकृत प्रणाली नहीं बनती, तब तक ऐसे अनेक मामलों में पीड़ित परिवारों को अपनी पीड़ा को साल‑डहाड़ तक खींचते देखना पड़ता रहेगा। यह एक सख्त वास्तविकता है, और यह तथ्य कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण इतने कई लोगों को अनसुलझी पीड़ा झेलनी पड़ती है, शायद ही अब अनदेखी की जा सके।
Published: May 6, 2026