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Category: समाज

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गुच्छा व्यक्तित्व परीक्षण: सोशल मीडिया पर बढ़ी अज्ञानता, स्वास्थ्य एवं शिक्षा में सरकारी चुप्पी

पिछले कुछ हफ़्तों में इंटरनेट पर एक असामान्य ‘व्यक्तित्व परीक्षण’ को भारी लोकप्रियता मिली है। इस परीक्षण में कहा जाता है कि मुट्ठी कसते समय अंगुली‑आंगुली की स्थिति से व्यक्ति के काम‑काज, दृढ़ता या बारीकी‑परता का पता चलता है। जाहिर है, यह सिद्धान्त वैज्ञानिक डेटा या किसी मान्य मनोविज्ञान‑शास्त्र पर आधारित नहीं है—बल्कि सामाजिक मीडिया के ‘छोटे‑छोटे ट्रेंड’ पर निर्मित एक कल्पना है।

ऐसे ‘ट्रेंड’ का असर केवल समय बिताने तक सीमित नहीं रहता। कई उपयोगकर्ता, बिना किसी पेशेवर सलाह के, खुद को या दूसरों को इस परीक्षण के अनुसार लेबल करने लगते हैं। परिणामस्वरूप, आत्म‑विश्वास में उतार‑चढ़ाव, अनावश्यक तुलना‑की‑धारा और कभी‑कभी मनोवैज्ञानिक तनाव उत्पन्न हो रहा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस प्रकार की असत्य जानकारी विशेषकर युवाओं और छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है।

शिक्षा क्षेत्र में भी इस अंधविश्वास की जड़ें गहरी हो रही हैं। कुछ स्कूलों में, जहाँ आधे‑विज्ञान के पाठ्यक्रम के साथ ‘आत्म‑विकास’ गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहाँ इस परीक्षण को ‘आधुनिक पर्सनालिटी एप्रोच’ के नाम से प्रस्तुत किया जाता है। यह न केवल शिक्षकों की नज़र में विषय‑सामग्री को भ्रमित करता है, बल्कि छात्रों को विज्ञान‑आधारित सोच से दूर ले जाता है।

इन घटनाओं पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया की बात करें तो, स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्रालयों से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं देखा गया। हालिया प्रेस विज्ञप्ति में केवल “सार्वजनिक जागरूकता के लिए डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम” की घोषणा की गई, परन्तु इस विशिष्ट ‘पर्सनैलिटी टेस्ट’ को रोकने या उसे हटाने की कोई योजना नहीं मालूम। यह चुप्पी न भूलाए जाने वाले ‘विलम्ब‑वर्ती’ का प्रतीक बन गई है, जहाँ नीति‑निर्माण का ‘ख़ाली काग़ज़’ अक्सर जनहित के सामने बैठ जाता है।

पिछले दशकों में डिजिटल misinformation को लेकर कई बार कड़ी कार्रवाई की गयी है, परन्तु ‘आँख‑विआँ’ जैसे हल्के‑फुल्के मनोवैज्ञानिक प्रयोगों पर अधिकारियों की ‘डिजिटल शुद्धता’ की अनदेखी फिर से सवाल उठाती है। क्या इस बात की गिनती नहीं होगी कि सरकार नागरिकों को तथ्य‑परक जानकारी उपलब्ध कराए, जबकि वे ‘क्लैम्पिंग‑टेस्ट’ के पीछे भागते रहें?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के ट्रेंड को रोकने के लिये तीन‑स्तरीय उपाय आवश्यक है: (i) वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान, (ii) स्कूल‑पाठ्यक्रम में ‘उपभोक्ता चेतना’ और ‘डिजिटल साक्षरता’ को अनिवार्य बनाना, और (iii) ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर गलत‑सूचना को तुरंत हटाने के लिये सख़्त नियामक ढाँचा। जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते, तब तक ‘गुच्छा व्यक्तित्व परीक्षण’ की धुंधली छाया हमारे सामाजिक‑मनोरोगी स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालती रहेगी।

सार में कहा जाए तो, एक छोटी‑छोटी बोरिंग मीटिंग में जाँघ‑टैप करना, या लिप‑काटना, अक्सर स्वाभाविक होते हैं; परन्तु एक ‘ग़ैर‑वैज्ञानिक’ परीक्षण को सत्य मान कर अपने आत्म‑मूल्य को आँकना, सामाजिक दायित्वों और प्रशासनिक जवाबदेही की तय‑करीबन परख बन जाता है। जब तक नीति‑निर्माता इस पर ध्यान नहीं देते, तब तक अनजाने में ही हम अपने मनोविज्ञान के ‘गुच्छे’ को अधिक गड़बड़ कर रहे हैं।

Published: May 8, 2026