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Category: समाज

कर्नाटक की 9‑साल की जस्पीरत कौर ने अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड से लिखी 35‑पृष्ठ की सबसे लंबी प्री‑टीन कथा पुस्तक

कर्नाटक के एक प्राथमिक विद्यालय की छात्रा, नौ साल की जस्पीरत कौर, ने इंटरनेशनल बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स से मान्यता प्राप्त कर एक नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया – प्री‑टीन आयु वर्ग की सबसे लंबी कथा पुस्तक लिखने का। 35 पृष्ठों का यह कार्य, "Beyond the Glitter: A Journey of True Worth", जस्पीरत ने अपने दसवें जन्मदिन से पहले पूरा किया। उसके शैक्षणिक दायित्वों को साधते हुए इस रचनात्मक उपलब्धि को हासिल करना, विशेष रूप से भारतीय प्रायोगिक शिक्षा प्रणाली की सीमाओं को उजागर करता है।

देश की मौजूदा शिक्षा नीति, विशेषकर नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020, में सृजनात्मकता को प्रोत्साहन देने का उल्लेख है, पर इसका कार्यान्वयन अक्सर अनुत्तरदायी रहता है। अधिकांश शैक्षणिक संस्थानों में, टेस्ट‑ड्रिवेन दृष्टिकोण के कारण कथा‑लेखन और अन्य कलात्मक अभिव्यक्तियों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता। ऐसी ही पृष्ठभूमि में जस्पीरत की उपलब्धि, दिखाती है कि व्यक्तिगत उत्साह और परिवार के समर्थन के बिना ऐसी सम्भावनाएँ अक्सर अनदेखी रह जाती हैं।

साथ ही, यह घटना सामाजिक असमानता के प्रश्न को भी उजागर करती है। जबकि शहरी मध्य‑वर्गीय परिवारों में पुस्तकालय, डिजिटल संसाधन और लेखन कार्यशालाओं तक पहुंच आसान है, ग्रामीण या आर्थिक‑संकटग्रस्त वर्ग के बच्चों के लिए ऐसी सुविधाएँ दुर्लभ हैं। यदि शैक्षणिक नीतियों को वास्तव में सभी वर्गों में रचनात्मकता को पोषित करना है, तो सरकार को पुस्तकालय‑निर्माण, मुफ्त लेखन‑प्रशिक्षण, तथा युवा लेखकों के लिए प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करने जैसी ठोस कदम उठाने चाहिए।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया की बात करते हुए, स्थानीय शिक्षा विभाग ने जस्पीरत की उपलब्धि पर बधाई ज्ञापन जारी किया, परन्तु इस निबंध को लेकर कोई दीर्घकालिक टैक्स्टबुक‑संकल्पना या राष्ट्रीय स्तर पर प्रेरणादायक मॉड्यूल का उल्लेख नहीं किया गया। यह दर्शाता है कि जब तक सफलता की कहानियों को नीति‑निर्माण में एकीकृत नहीं किया जाता, तब तक ऐसी चिंगारियाँ मौसमी प्रशंसा तक सीमित रह जाएँगी।

जस्पीरत का कारनामा यह भी सवाल उठाता है कि क्या भारत के स्कूल‑प्रणाली में ‘अधिकतम पृष्ठों वाली कथा पुस्तक’ लिखना किसी के लिये असम्भव लक्ष्य नहीं बन गया। शिक्षकों को रचनात्मक लेखन को पाठ्यक्रम में समाविष्ट करना चाहिए, छात्रों को विचार‑मंथन के लिये समय देना चाहिए, और अभिभावकों को इसी दिशा में समर्थन प्रदान करना चाहिए। तभी ऐसा नहीं कि केवल कुछ चुने हुए बच्चे ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज़़ पहुँचा सकें।

आगे बढ़ते हुए, यह कहा जा सकता है कि जस्पीरत कौर की कहानी न सिर्फ एक व्यक्तिगत विजय है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा‑परिदृश्य में निहित बहु‑परतीय चुनौतियों को उजागर करती है। यदि नीतिनिर्माताओं और प्रशासनियों ने इस अवसर को गंभीरता से लिया, तो संभव है कि अगली पीढ़ी के धीरज और सृजनात्मकता को सशक्त बनाकर नई रिकॉर्ड‑उपलब्धियों को साकार किया जा सके।

Published: May 5, 2026