कोलकाता के अनजान अनुभवों में उजली सामाजिक असमानता और प्रशासनिक लापरवाही
कोलकत्ता, जो आमतौर पर हावड़ा पुल, विक्टोरिया मेमोरियल और सर्दियों की चाय की उन महकती गलियों के नाम पर जाना जाता है, अब अपने ‘असामान्य’ कोनों में एक अलग कहानी बयां कर रहा है। यात्रा‑पर्यटन के विज्ञापन में अक्सर इन अनूठे स्थानों को ‘खज़ाना’ कहा जाता है, पर असल में ये खज़ाना स्थानीय जनता के बुनियादी अधिकारों की कमी का प्रकट रूप बन चुका है।
पहले तो इन खंडहरों और कलाकृतियों को देखना कुछ नया नहीं, परंतु सड़कों पर फैले कचरे का ढेर, असंगठित जल‑संधान और स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी, इन अनुभवों को असहाय बनाती है। जहाँ एक पर्यटक को ‘सड़कों के किनारे रचनात्मक कला’ दिखाने की कोशिश की जा रही है, वहीं स्थानीय निवासी रोज़मर्रा की जलवायु‑उपयुक्त साफ-सफाई, सुरक्षित रहने योग्य आवास और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से वंचित हैं। इस असमानता का द्योतक है कि वही स्थान, जो सैलानी बांधों के नक़्शे पर लुभावने लगते हैं, अक्सर उन लोगों के जीवन को पीड़ित बनाते हैं जिनके पास दुर्गंध‑मुक्त हवा या निलंबित जल नहीं है।
शिक्षा के संदर्भ में भी स्थिति समान है। कई ‘छिपे हुए’ सांस्कृतिक केन्द्र, जिनमें स्थानीय कलाकार अपने काम की प्रदर्शनी लगाते हैं, उनके पास बुनियादी बुनियादी संस्थाएँ नहीं हैं: न तो उचित प्रकाश‑व्यवस्था, न ही सुरक्षा के लिये आवश्यक संरचना। इससे न केवल शिक्षा‑केन्द्रित यात्रियों का अनुभव प्रभावित होता है, बल्कि इन कलाकारों के बच्चों की पढ़ाई‑लिखाई भी बाधित रहती है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर कागजी जवाबों में ही सिमट जाती है। नगर निगम के बयान में ‘परीक्षण‑पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु नई योजनाएँ’ का उल्लेख मिलता है, पर वास्तविक कार्यवाही में ठोस बजट आवंटन या समय‑बद्ध योजना का अभाव रहता है। स्थानीय प्रतिनिधियों ने कई बार पुनः पुनः बुनियादी सुविधाओं के लिये अपील की है, पर अंततः कोई ठोस सुधार नहीं देखा गया। यही कारण है कि सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न हर बार खींचा जाता है, पर समाधान का मार्ग अक्सर धुंधला रह जाता है।
इन बिन्दुओं को उजागर करने का उद्देश्य न सिर्फ पर्यटकों को चेतावनी देना है, बल्कि प्रशासन को यह स्मरण कराना भी है कि ‘असामान्य अनुभव’ शब्द के पीछे सच्ची प्रगति तभी संभव है, जब बिन‑बुनियाद मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संरचनाओं का एक साथ पुनर्निर्माण हो। तब ही कोलकाता अपनी विरासत‑स्मृति को सच्ची शान में प्रस्तुत कर पाएगा, न कि केवल बाहरी चमक‑धूप के पीछे छिपी असमानता के रूप में।
Published: May 5, 2026