कोलंबिया के सिएरा नेवादा में बढ़ती हिंसा ने पर्यटन और स्वदेशी समुदायों को धकेला जोखिम में
कोलंबिया के दक्षिणी भाग में स्थित सिएरा नेवादा, जो अपने अद्वितीय पहाड़ी परिदृश्यों और जीव‑जंतुओं के कारण अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आकर्षण बन गया था, अब सशस्त्र समूहों की उभड़ती लूट‑मार और क्षेत्रों के लिए लड़ाई के कारण संकट में गिर गया है।
स्थानीय स्वदेशी बन्धुओं, जिनके पास इस भूमि के प्राचीन अधिकार हैं, अब रोज़मर्रा की आवाज़ें सुनते हैं — ध्वज‑ओवर‑ड्रोन से नहीं, बल्कि हथियार‑के‑ध्वनि से। इन समूहों ने क्षेत्र के छोटे‑बड़े व्यापारियों, गाइडों और होटल मालिकों से 'सुरक्षा कर' वसूला, जबकि अपनी खुद की इलाक़े की हक़ीक़त को पैसों में बदलते दिखते हैं।
पर्यटन‑केन्द्रित नौकरियों पर निर्भर छोटे‑सहानुभूति वाले लोग, जिन्हें कभी बाहरी दुनिया से आय का स्रोत मिलने को लेकर आशा थी, अब यात्रियों के रद्दीकरण और बुकिंग में गिरावट देख रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह महीनों में पर्यटक प्रवाह में लगभग 40 % की गिरावट आई है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ रहा है।
पर्यटन के महत्व को समझाते हुए, राष्ट्रीय सरकार ने कई बार इस क्षेत्र की “राष्ट्र‑धरोहर” स्थिति का उल्लेख किया है, पर वास्तविक कदम अक्सर “मुसाफ़िरों के साथ मिलकर कार्यक्रम” या “पर्यटन‑प्रोत्साहन काउंसिल” के रूप में सीमित रहे हैं। स्थानीय पुलिस बटालियन की तैनाती का औपचारिक बयान जारी किया गया, पर उनका कवरेज अक्सर “भौगोलिक कठिनाई” के बहाने से सीमित रहा। बैक‑ऑफ़िस में, संरक्षण‑सम्बंधी नीतियों की कागजी कार्रवाई में “बजट‑अनुमोदन” शब्द का अधिक प्रयोग होता है, जबकि मैदान में उतरने की तत्परता कम दिखाई देती है।
स्वदेशी समुदायों के लिए स्थिति और अधिक नाज़ुक हो गई है। कई गांवों ने अपने पारम्परिक स्कूलों को बंद कर दिया है क्योंकि शिक्षक और छात्र दोनों ही सुरक्षा जोखिमों के कारण शैक्षणिक गतिविधियों से हट गए हैं। स्वास्थ्य केन्द्र भी संक्रमण‑रहित नहीं रहे; चोरी‑छिपे आपूर्ति और डाक्टरों की अनुपस्थिति ने रोग‑प्रसार को तेज़ कर दिया है।
ऐसे में, नीतियों के दांव‑पेंच को समझाने वाले अधिकारी अक्सर “सुरक्षा‑परिस्थिति का व्यक्तिगत पहलू” बताते हैं, जबकि असली मुद्दा प्रशासनिक ढाँचे की अक्षमता और स्थानीय आवाज़ों को सुनने की अनिच्छा है। कोई भी ठोस पुनः‑निर्माण योजना, मौजूदा धन के पुनः‑वितरण या पुनर्वास‑कार्य के लिए स्पष्ट समय‑सीमा नहीं दी जा रही है।
समाज के हित में यह सवाल उठता है कि जब एक प्राकृतिक धरोहर को आर्थिक लाभ के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए भी मान्यता मिली है, तो क्यों उसे सशस्त्र गुटों के खेल का मैदान बना दिया गया है? इस प्रश्न के उत्तर में केवल निराधार आश्वासनों के बजाय ठोस कार्य‑पद्धति और उत्तरदायी निगरानी की जरूरत है, नहीं तो “पर्यटन‑वृद्धि” के बिलंबित वादे केवल कागज़ पर ही रह जाएंगे।
Published: May 6, 2026