ऑपेरा गायिका जेनिन रोबुड़क की कोकलियर इम्प्लांट सर्जरी ने स्वास्थ्य नीति में नई दिशा की ओर इशारा किया
लंदन की 72‑वर्षीय ऑपेरा गायिका जेनिन रोबुड़क ने पिछले महीने दोहरी कोकलियर इम्प्लांट सर्जरी करवा कर अपने ह्रदय में गूँजते संगीत को फिर से सुनना शुरू किया। तीस साल से वह अपने सुनने की कमी को छुपाकर मंच पर अपनी आवाज़ का जादू बिखेरती रही, जबकि वास्तविकता में वह पूर्ण बहरेपन के दायरे में थी। यह सर्जरी, जिसे अभी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) के एक बड़े प्रयोगात्मक कार्यक्रम के तहत किया गया, उनके लिए केवल व्यक्तिगत विजय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य‑नीति की दिशा में एक चेतावनी भी बन गई।
कोकलियर इम्प्लांट, तकनीकी रूप से एक कृत्रिम कर्णभ्रमण प्रणाली है, जो श्रवण तंत्र की क्षति को पार कर सीधे मस्तिष्क तक ध्वनि संकेत पहुँचाती है। रोबुड़क के केस में दोहरी इम्प्लांट ने न केवल उनके श्रवण क्षितिज को विस्तृत किया, बल्कि उन्होंने यह भी उजागर किया कि ऐसी तकनीकें कितनी देर तक सामाजिक अंधविश्वास और प्रशासनिक सुस्ती के कारण सामान्य नहीं हो पाईं।
इस सर्जरी को राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण हेतु आज़माया जा रहा है, जिससे हजारों समान समस्याओं से जूझते नागरिकों को लाभ मिल सके। लेकिन इसमें एक बड़ी सामाजिक खाई भी छिपी हुई है: जबकि तकनीक उपलब्ध है, कई ध्वनिक शारीरिक विकलांगता वाले individuals को सही समय पर निदान और उपचार नहीं मिल पाता। श्रोताओं के लिए यह एक व्यंग्यात्मक सत्य है कि एक ऐसा देश जहाँ स्वास्थ्य‑सेवा का जश्न आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान के संगम पर लगाया जाता है, वह अभी भी सुनने में अंधा हो सकता है।
सरकारी स्वीकृति और वित्तीय समर्थन की बात करें तो NHS ने इस प्रयोगात्मक कार्यक्रम को बजट के एक अल्प हिस्से में चलाने का वादा किया है। आलोचक इस बात को उजागर करते हैं कि “भुगतान‑पर‑सेवा” मॉडल के तहत ऐसे अद्यतन उपचार अक्सर सिर्फ शहरी क्षेत्रों में सीमित रह जाते हैं, जबकि ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए यह एक अकल्पनीय सपने जैसा बन जाता है।
जिनिन रोबुड़क के अनुभव से स्पष्ट होता है कि सामाजिक कलंक और प्रशासनिक लापरवाही ने कई व्यक्तियों को अपने वास्तविक शारीरिक स्थिति को स्वीकार करने से रोक दिया। उनका 30‑सालों का ‘गुप्त’ बहरेपन एक दुखद उदाहरण है कि कैसे स्वास्थ्य‑सेवा प्रणालियों को न केवल तकनीकी नवाचारों के साथ चलना चाहिए, बल्कि सार्वजनिक जागरूकता, शीघ्र निदान और समावेशी नीतियों के साथ भी।
भविष्य में कोकलियर इम्प्लांट को आम जन स्वास्थ्य‑सेवा का हिस्सा बनाना संभव है, बशर्ते नीति‑निर्माताओं को इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़े कि अंधेरे में रहने वाले लोगों को केवल “बातों‑बातों में” नहीं, बल्कि ठोस वित्तीय, बुनियादी ढांचा और सामाजिक समर्थन के माध्यम से उजागर किया जाना चाहिए। तभी यह ‘जिंदगी‑बदलने वाली’ सर्जरी केवल मंच पर नहीं, बल्कि देश के हर घर में सच्ची परिवर्तन लाएगी।
Published: May 6, 2026