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Category: समाज

ऑप्टिकल इल्यूजन व्यक्तित्व परीक्षण: मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में नियमन की कमी पर सवाल

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक अनजाने optical illusion – जिसमें स्वान या ऑर्केस्ट्रा को पहले देखना तय करता है कि व्यक्ति रिश्तों में किस प्रकार का व्यवहार अपनाता है – तेजी से वायरल हो गया है। परीक्षण पर आधारित कथन सरल होते हैं: "यदि आप पहले स्वान देखते हैं तो आप शांति‑परायण, क्षमाशील स्वभाव वाले माने जाएंगे; यदि ऑर्केस्ट्रा पहले दिखता है तो गहरी जुड़ाव की इच्छा दिखाई देती है"।

ऐसे मनो‑विज्ञान‑आधारित स्नाने का आकर्षण कभी‑कभी युवा वर्ग में आत्म‑जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से कहा जाता है, परंतु भारत में उचित नियमन के अभाव में यह असुरक्षित वर्गों पर अनपेक्षित दबाव डाल रहा है। कई शैक्षणिक संस्थानों ने इसे विद्यार्थियों की भावनात्मक बुद्धिमत्ता की जाँच के लिये अनौपचारिक रूप में अपनाया, जबकि सरकारी या वैध प्रोफेशनल काउंसलिंग की व्यवस्था अभी भी सीमित है।

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में 2017 के राष्ट्रीय नीति द्वारा यह कहा गया कि शोध‑आधारित उपकरणों को प्रमाणित कर ही उपयोग में लाया जाना चाहिए। परंतु इस नीति के तहत लागू निगरानी तंत्र आज भी नीरस दिखता है। जब एक सरल दृश्य जाल को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता, तो क्यों न अधिक जटिल मानकीकृत स्केल को प्राथमिकता दी जाए?

वास्तविकता यह है कि कई असुरक्षित वर्ग – छात्र, न्यूनतम आय वाले श्रमिक और वृद्ध नागरिक – इस तरह के परीक्षण को अपनी भावनात्मक स्थिति के मापदंड के रूप में ले लेते हैं। बिना योग्य व्याख्या के परिणामों को अपनाना, गलतफहमी और आत्म‑संशय को जन्म दे सकता है, जिससे सार्वजनिक मनो‑स्वास्थ्य पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यही कारण है कि सामाजिक कार्यकर्ता और मनो‑वैज्ञानिकों की creciente शिकायतें अनदेखी रह गई हैं।

प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह मुद्दा दो पहलुओं में उभरता है। प्रथम, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर ऐसे कंटेंट को सेंसर या सत्यापित करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है; द्वितीय, मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में बजट की कमी और ग्रामीण‑शहरी असमानता लगातार बाधा बनती है। जब सरकारी कार्यालयों की उत्तरदायित्व‑प्रणाली की झलक मिलती है – "आपके प्रयोग का कोई प्रमाण नहीं है, परन्तु अगले महीने ही नई नीति तैयार" – तो सार्वजनिक भरोसा टूटता ही नहीं, गिर जाता है।

इन समस्याओं के समाधान के लिए दो उपाय आवश्यक दिखते हैं: (१) ऐसी सभी मनो‑मापन तकनीकों को राष्ट्रीय मानक बोर्ड के तहत पंजीकरण कराना, जिससे केवल प्रमाणित परीक्षण ही उपयोग में लाई जाए; (२) न्यूनतम स्तर की मनो‑परामर्श सेवाओं को स्कूलों, कामगार केंद्रों और वृद्धावस्था घरों में अनिवार्य रूप से स्थापित करना। यह केवल नीति के शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि वास्तविक कार्यान्वयन का परीक्षण भी होगा।

सारांश में, ऑप्टिकल इल्यूजन व्यक्तित्व परीक्षण की लोकप्रियता ने भारत के मानसिक स्वास्थ्य ढाँचे में मौजूदा अंतराल को उजागर किया है। यह सवाल केवल निजी प्रयोग का नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्रशासन और नीति-निर्माण की तत्परता का भी है – कि क्या हम सामाजिक विमर्श में केवल हल्की‑फुल्की चतुराई के अलावा गंभीर उत्तरदायित्व प्रदान कर सकते हैं।

Published: May 3, 2026