जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

ऑप्टिकल इल्युजन व्यक्तित्व परीक्षण के प्रचार में प्रशासनिक लापरवाही उजागर

देश के कई शैक्षणिक संस्थानों और निजी करियर काउंसलिंग केंद्रों में हाल ही में एक साधारण दृश्य पहेली – शेर और बंदर की तस्वीर – को "व्यक्तित्व परीक्षण" के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके निर्माताओं का दावा है कि यदि निरीक्षक पहले शेर देखता है तो वह स्वाभाविक नेता है, जबकि पहले बंदर देखना रचनात्मकता और जिज्ञासा दर्शाता है। ऐसी बौद्धिक अनुक्रमणीयता को "मस्तिष्क के आधे हिस्से की प्रमुखता" कहा गया है।

क्विक‑टेस्ट की लोकप्रियता के पीछे एक बड़ा सामाजिक कारण है: अभिभावकों और छात्रों की तेज‑सफलता की इच्छा। जब विद्यालयों में इस तरह के परीक्षणों को आधिकारिक विकास कार्यशालाओं के भाग के रूप में मान्यता दी जाती है, तो यह न केवल वैध मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की जगह लेता है, बल्कि युवा वर्ग में भ्रम भी उत्पन्न करता है। स्वास्थ्य‑मानसिक दृष्टिकोण से यह अनावश्यक आत्म‑अवलोकन और अस्वस्थ तुलना को उत्पन्न करता है, जिसकी कोई क्लिनिकल साक्ष्य नहीं है।

शिक्षा विभाग ने इस प्रकार के परीक्षणों को मान्य करने या रोकने के लिये कोई स्पष्ट दिशा‑निर्देश जारी नहीं किया है। इसके विपरीत, कई नगर निगमों ने इन ऑनलाइन क्विज़ को नागरिक साक्षरता कार्यक्रम के हिस्से के रूप में प्रचारित किया, जिससे नीति‑कार्यान्वयन में स्पष्ट असंगति दिखती है। जब सरकारी संचार में “रचनात्मकता‑नेतृत्व” के ऐसे असामाजिक लेबल को थोप दिया जाता है, तो सामाजिक असमानता और वर्ग विभाजन अधिक गहरा हो जाता है – क्योंकि अक्सर ये मुफ्त में ऑनलाइन उपलब्ध होते हैं, जबकि ग्रामीण एवं कम आय वर्ग के छात्र उचित मनोवैज्ञानिक परीक्षण तक पहुँच भी नहीं पा पाते।

व्यावसायिक संस्थानों ने इस गुफ्तगु पर लाभ उठाया है। शैक्षणिक उद्यमियों ने इस परीक्षण को “स्मार्ट करियर परामर्श” के नाम से पैकेज किया, जिससे छात्रों को महँगे फॉर्मेटिव मूल्यांकन से पहले ही नकली आत्म‑विश्वास मिल जाता है। यह न केवल उपभोक्ता संरक्षण के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य – सतही लेबल की बजाय वास्तविक कौशल विकास – के विरुद्ध है।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया की कमी से स्पष्ट होता है कि नीति‑निर्माताओं ने डिजिटल स्वास्थ्य‑साक्षरता और मनोवैज्ञानिक परीक्षण के मानकों को अनदेखा कर दिया है। विशेषज्ञों का तर्क है कि ऐसे भ्रम को रोकने के लिये न केवल स्पष्ट नियमावली चाहिए, बल्कि स्कूल‑प्रमुखों तथा पालक जागरूकता कार्यक्रम भी अनिवार्य हैं। वरना, “शेर‑बंदर परीक्षण” जैसी कुख्यात विधियों से उत्पन्न गलतफहमी से भविष्य के नागरिकों के आत्म‑मूल्यांकन में गिरावट, अस्थायी आत्म‑विश्वास का निर्माण और अंततः सामाजिक मनोवृत्ति पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

जब तक सरकार इस प्रकार के प्रचार‑प्रसार को ठोस वैधता के ढाँचे में नहीं लाती, तब तक नागरिकों को सावधानीपूर्वक व्यक्तिगत विकास के वास्तविक साधनों की खोज करनी होगी, न कि झट‑पटा इल्युजन‑टेस्ट पर भरोसा करना।

Published: May 4, 2026