ऑनलाइन व्यक्तित्व परीक्षण की बढ़ती धूम: मानसिक स्वास्थ्य नीति पर सवालों की लहर
पिछले कुछ हफ्तों में सोशल मीडिया पर एक सरल सवाल-जबाब वाला व्यक्तित्व परीक्षण बहुत तेज़ी से वायरल हुआ है। चार वस्तुओं—टूटा हुआ दर्पण, पुरानी डायरी, जंग लगा चाबी, या मुरझाया फूल—में से पहली पसंद के आधार पर परीक्षण करने वाले को उनके वर्तमान मनःस्थिति के बारे में एक छोटा‑सा सार दिया जाता है। विज्ञापन से लेकर निजी मानसिक‑स्वास्थ्य ऐप्स तक इस तरह के क्विज़ को ‘स्व‑जागरूकता’ के रूप में पेश किया जाता है, जबकि उनका आधार अक्सर मनोवैज्ञानिक शोध पर नहीं बल्कि काव्यात्मक व्याख्याओं पर रहता है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव कई वर्षों से चर्चा का विषय है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) और हाल ही में चल रही ‘मन:शीलता’ पहल के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति लाख जनसंख्या पर केवल एक मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध है। इस कमी को देखते हुए, आम जनजीवन में व्यावसायिक परीक्षणों की ओर रुख बढ़ना कोई आश्चर्य नहीं है; सस्ते, तुरंत उपलब्ध और सोशल मीडिया पर शेयर‑लाईक होने के कारण ये क्विज़ एक त्वरित राहत का स्वरूप ले लेते हैं।
परंतु इस त्वरित राहत के पीछे गहरी चिंता छिपी है। पहला, ऐसे परीक्षण अक्सर व्यक्तिगत कठिनाइयों को ‘क्वीक्स’ के रूप में छोटा‑छोटा कर देते हैं, जिससे गहरी समस्या होने पर पेशेवर मदद लेने में बाधा उत्पन्न हो सकती है। दूसरा, सरकारी नीतियों की बात तो यही है कि वे ‘सेंसरशिप‑फ्री डिजिटल हेल्थ’ को बढ़ावा देती हैं, पर जमीन पर इस डिजिटल स्वास्थ्य के उपयोग को लेकर स्पष्ट नियामक ढाँचा नहीं है। अर्थात, ‘इंटेलिजेंट हेल्थ’ की घोषणा होना, जबकि इस तरह के परीक्षणों का वैज्ञानिक मूल्यांकन न होना, एक विडंबनात्मक विरोधाभास पेश करता है।
यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है। जब स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में ‘डिजिटल वेलनेस अभियान’ लॉन्च किया, तो इसे समर्थन देने के लिए बजट में केवल 0.2% ही आवंटित किया गया, जबकि प्रत्येक वर्ष लगभग 2 करोड़ लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं। उम्मीद है कि इस आँकड़े को देख कर नीति‑निर्माताओं को यह समझ आएगा कि ‘टेस्ट‑टैब’ की बजाय ‘ट्रेन‑डॉक्टर’ को प्राथमिकता देनी चाहिए।
सामाजिक दृष्टिकोण से यह भी देखना आवश्यक है कि कौन इस परीक्षण को सबसे अधिक उपयोग करता है। शहरी मध्यम‑वर्गीय युवा वर्ग, जो अक्सर शिक्षा‑उद्यमशीलता के दबाव में रहता है, इन क्विज़ को ‘करियर‑कोचिंग’ के साथ मिलाकर देखता है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण यह परीक्षण केवल शोर‑गुल बन जाता है, जबकि असली मदद के लिए दूरदराज क्षेत्रों में काउंसलिंग सेंटर की कमी है।
इसलिए, यह जरूरी है कि ऑनलाइन व्यक्तित्व परीक्षणों को मानवीय सहायता के साधन के रूप में नहीं, बल्कि ‘सूचना‑साक्षरता’ के प्रयोग के रूप में देखा जाए। सरकार को चाहिए कि वह ऐसे डिजिटल सामग्री की सत्यता की जाँच के लिए एक स्वतंत्र निकाय स्थापित करे, साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए सरकारी‑निजी भागीदारी को सुदृढ़ करे। तभी ‘स्व‑जागरूकता’ के नाम पर मिलने वाली अस्थायी तृप्ति, वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा में बदल सकेगी।
Published: May 4, 2026