जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

ऑनलाइन व्यक्तित्व परीक्षणों की धुंधली सच्चाई: मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल साक्षरता पर सवाल

पिछले सप्ताह सोशल मीडिया पर एक optical illusion वाला छवि तेज़ी से लोकप्रिय हुई। दर्शकों को पहले क्या दिखता है – “एक महिला जो दर्पण में देख रही है”, “एक खोपड़ी” या दोनों‑साथ – यह पूछकर परीक्षण यह दावा करता है कि पहली प्रतिक्रिया से व्यक्ति की भावनात्मक प्रकृति, सहानुभूति या संतुलन स्पष्ट हो जाता है। इस तरह के ‘व्यक्तित्व परीक्षण’ को विज्ञान के रूप में पेश करके कई उपयोगकर्ता इसे व्यक्तिगत समझ‑कोश या आत्म‑विकास के साधन मानते हैं।

हालाँकि, इस प्रयोग की वैधता पर कोई भी वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है। मनोविज्ञान के मानकों के अनुसार आत्म‑रिपोर्ट स्केल, संरचित प्रश्नावली और पुनरावृत्ति परीक्षण ही विश्वसनीय माने जाते हैं, जबकि केवल एक त्वरित दृश्य‑प्रतीक्षा से नतीजा निकालना पायजामा‑जैसे अनुमान से कम नहीं। इस प्रकार की छद्म‑वैज्ञानिक सामग्री, विशेषकर युवा वर्ग में, मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है – कभी‑कभी आत्म‑सम्बन्धी विचारों में उलझन, कभी‑कभी अकारण आत्म‑आलोचना।

डिजिटल साक्षरता की कमी और मनोरंजन‑के‑साथ‑सूचना का मिश्रण इस समस्या को तेज़ी से फैलाता है। कई ऑनलाइन मंचों ने इस परीक्षण को बिना तथ्य‑जाँच के वायरल कर दिया, जबकि उपयोगकर्ताओं को यह भी नहीं बताया गया कि यह किसी मान्यता प्राप्त मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित नहीं है। ऐसे माहौल में, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक दो‑तीन प्रश्न पूछना जरूरी बन जाता है: क्या यह परीक्षण मनो‑समर्थन के लिए जोखिम पैदा कर रहा है? क्या यह चिकित्सकीय सलाह का विकल्प बन रहा है?

प्रशासनिक तौर पर, सूचना एवं प्रसार के मंत्रालय ने पहले ही कहा है कि साइबर साइंस‑डिसइन्फ़ॉर्मेशन को रोकने के लिए मौजूदा दिशानिर्देशों का प्रयोग किया जाएगा। हालांकि, इस दिशा‑निर्देश में विशिष्ट रूप से ‘व्यक्तित्व‑टेस्ट’ जैसी अवधारणा को नहीं जोड़ा गया है, जिससे यह बयान कुछ हद तक “हवा में बात” बन जाता है। स्वास्थ्य विभाग, जो अक्सर मानसिक‑स्वास्थ्य विषयकों पर जागरूकता अभियानों को चलाता है, ने अभी तक इस वायरल सामग्री के खिलाफ कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है। यह खाली खिड़की वही दर्शाती है, जहाँ नीति‑निर्माण और वास्तविक कार्य के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है।

शिक्षा क्षेत्र भी इस जाल में फँस सकता है। विद्यालय‑स्तर के छात्रों को अक्सर प्रेरणा‑सत्र में ‘खुद‑को जानने’ के रूप में ऐसे परीक्षणों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि शिक्षक‑ट्रेनिंग में डिजिटल‑साक्षरता के मूल सिद्धांत को पर्याप्त रूप से नहीं जोड़ा गया है। इससे साक्षरता‑प्रशिक्षण का शैक्षिक लक्ष्य ही धुंधला हो जाता है।

इन सबके बीच, विशेषज्ञों ने पुकार लगाई है कि मानसिक‑स्वास्थ्य के गंभीर मुद्दों को हल्के‑फुलके ‘मनोरंजन‑कंटेंट’ के साथ नहीं मिलाना चाहिए। इसके लिए एक बहु‑पक्षीय पहल की जरूरत है: वैज्ञानिक संस्थानों को हित‑ग्राहक‑सामग्री के सत्यापन को तेज़ बनाना, स्वास्थ्य मंत्रालय को ऐसे कंटेंट को ‘ऑनलाइन चिकित्सकीय जानकारी’ के रूप में वर्गीकृत करना और शिक्षण संस्थानों को डिजिटल‑साक्षरता को प्राथमिकता देना।

जब तक इन कदमों को ठोस रूप‑में लागू नहीं किया जाता, इस तरह के ‘ऑप्टिकल इल्युजन‑टेस्ट’ को केवल एक बिंदी‑भरे लेज़र की तरह ही देखा जाएगा – चमकीला, आकर्षक, पर प्रभावी ढंग से दोगुना जोखिम पैदा करने वाला।

Published: May 7, 2026