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ऑटिज़्म से जूझते छात्रों और पुरुषों की मानसिक सहायता में प्रणालीगत झंझट
ब्रीटिश रैपर प्रोफ़ेसर ग्रीन (असली नाम स्टीफ़न मेंडर्सन) ने हाल ही में अपने स्कूल‑जीवन में ऑटिज़्म के कारण झेली गई कठिनाइयों को खुलकर बताया। उन्होंने यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या के कारण उन्हें कई बार अनदेखी और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ा। इस खुलासे के बाद उन्होंने ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ काउंसलिंग एंड साइकथेरपी (BACP) के साथ सहयोग किया, जिसने इस बात को रेखांकित किया कि सात में से दस पुरुष गंभीर दशा तक पहुँचने के बाद ही सहायता चाहते हैं।
भारत में भी समान चुनौतियाँ मौजूद हैं। शैक्षणिक संस्थानों में ऑटिज़्म से ग्रस्त छात्रों को अक्सर सही समझ और समर्थन नहीं मिलता। कई स्कूलों में विशेष शिक्षक या सहायक सुविधाएँ अनुपलब्ध हैं, जिससे छात्र वर्ग में सामाजिक अंतर बढ़ता है। वहीं, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कलंक ने उन्हें पेशेवर मदद लेने से रोके रखा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में यह संकेत मिलता है कि पुरुष जनसंख्या में तनाव‑जनित बीमारियों की रिपोर्टिंग कम है, जबकि वास्तविक स्थिति उलट-पुलट हो सकती है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह दोहरी असमानता स्पष्ट है: शिक्षा नीति में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा के लिए स्पष्ट दिशा‑निर्देशों का अभाव, और स्वास्थ्य नीति में मनोवैज्ञानिक सेवाओं की पहुँच को सीमित करने वाले बुनियादी ढाँचे की कमी। मानक औपचारिक प्रक्रियाएँ अक्सर जटिल और समय‑सापेक्ष होती हैं, जिसके कारण जरूरतमंद व्यक्तियों को मदद मिलना देर से ही संभव होता है। यही कारण है कि कई मामलों में संकट के बाद ही सहायता ली जाती है, जैसा कि BACP की रिपोर्ट में उजागर किया गया है।
इन समस्याओं के सामाजिक परिणाम गहरे हैं। शिक्षा के प्रारम्भिक वर्ष में असहाय महसूस करने वाले छात्र भविष्य में रोजगार‑योग्यता, सामाजिक एकीकरण और आत्म-सम्मान में बाधाएँ देखते हैं। वहीं, पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य में देरी से निपटने में असफलता अक्सर पारिवारिक तनाव, कार्यस्थल उत्पादकता में गिरावट और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है।
नीति‑निर्माताओं को अब इस दोहरी कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समावेशी पाठ्यक्रम और प्रशिक्षित शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम अनिवार्य किए जा सकते हैं। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में मुफ्त या कम लागत वाले मनोवैज्ञानिक परामर्श केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर, विशेषकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, पुरुषों को शुरुआती चरण में ही मदद लेने की सुविधा मिल सकती है।
समुदाय‑स्तर पर भी व्यावहारिक पहल आवश्यक है। स्कूलों में संवेदनशीलता कार्यशालाओं, अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और आत्म‑सहायता समूहों की स्थापना से सामाजिक stigma को कम किया जा सकता है। प्रशासनिक जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिए पारदर्शी grievance mechanisms और नियमित ऑडिट आवश्यक हैं, जिससे नीतियों के कार्यान्वयन में दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहे।
जैसे प्रोफ़ेसर ग्रीन ने अपने अनुभव शेयर किए, वैसे ही भारत में लाखों युवा और पुरुषों को अपनी कहानी कहने का मंच चाहिए— ताकि नीति‑निर्माताओं को याद रहे कि वैध सहायता की देरी सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में बाधा है।
Published: May 7, 2026