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एलोन मस्क की ‘बच्चे मेरे हैं, कुछ नहीं रखते’ टिप्पणी ने उजागर किया अभिभावक‑शिशु उत्तरदायित्व का नीति अंतराल
अमेरिका के उद्योगपति एलोन मस्क ने हाल ही में सोशल मीडिया पर बताया कि उनके बच्चे "उनकी इच्छा से जन्म नहीं लिये गए" और "वे उनसे कुछ नहीं चाहते" – यह बयान कई देशों में अभिभावक‑बाल अधिकार के सवाल को फिर से ताज़ा कर रहा है। भारत में इस प्रकार के खुले‑खुले बयानों को सुनना असामान्य नहीं रहा, परन्तु यह हमें मौजूदा कानूनी ढाँचे और प्रशासनिक कार्रवाई की कुप्रभावशीलता की ओर इशारा करता है।
संविधान के अनुच्छेद 21‑B के तहत सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिला है, जबकि बच्चे के कल्याण, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बाल संरक्षण अधिनियम (2005) का अस्तित्व है। फिर भी कई राज्यों में बाल पोषण योजनाओं की समयबद्ध कार्यवाही और निगरानी में खामियाँ स्पष्ट दिखती हैं। ग्रामीण इलाकों में अभिभावक‑शिशु संबंधों का दुरुपयोग, बाल मजदूरी और शिक्षा से वंचित होने की कहानियाँ अक्सर समाचार बनती हैं, परंतु नीति‑कार्यान्वयन में ‘ज्यादा शब्द, कम काम’ की स्थिति बनी हुई है।
मस्क की टिप्पणी को सामाजिक स्तर पर दोधारी तलवार माना जा सकता है। एक ओर यह अभिभावक की जिम्मेदारी पर प्रश्न उठाता है कि क्या वे मात्र ‘संसाधन प्रदाता’ बनने के साथ-साथ अपने बच्चों को सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी अधिकारों से वंचित कर रहे हैं। दूसरी ओर, यह उन परिवारों के लिए अनपेक्षित बोझ बन सकता है जो पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों में जी रहे हैं, जहाँ अभिभावक के आश्रित होने की स्थिति को ‘धनराशि के नाते’ नहीं, बल्कि ‘अधिकारों के रूप में’ माना जाना चाहिए।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया अभी तक स्पष्ट नहीं रही। अधिकांश राज्य शिशु एवं मातृ स्वास्थ्य विभाग ने इस विषय को ‘अलग‑अलग सामाजिक मुद्दे’ के रूप में वर्गीकृत किया, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकार आयोग ने कहा कि सार्वजनिक जागरूकता और अभिभावक‑शिशु संबंधों की नियमित निगरानी के लिए एकीकृत मंच की आवश्यकता है। लेकिन मौजूदा मंचों के सदस्यों की नियुक्तियों में अक्सर राजनीतिक तर्कशक्ति की झलक मिलती है, जिससे कार्यवाही का दीर्घकालिक असर सीमित रह जाता है।
व्यंग्य यह है कि जब धनि उद्यमी अपने बच्चों से ‘कोई ऋण नहीं’ की बात कर रहे हैं, तो उसी समय हमारी नीतियों में ‘बच्चों को सामाजिक सुरक्षा का ऋण’ बकाया है। यह असमानता केवल आर्थिक अंतर को नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा के अभिकल्पन में भी दरारें दिखाती है। यदि नीति‑निर्माण में अभिभावक के नैतिक कर्तव्य को स्पष्ट करने के बजाए, प्रशासनिक कहानियों को ‘रिपोर्ट‑ड्राफ्ट‑पुस्तकालय’ में रख दिया जाए, तो वास्तविक सुधार के अवसर बस सुलगते रह जाएंगे।
भविष्य में यह आवश्यक है कि नीति-निर्माताओं द्वारा अभिभावक‑बाल उत्तरदायित्व को मात्र वैचारिक विमर्श तक सीमित न किया जाए, बल्कि इसे बाल स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के ठोस मानकों में उतारा जाए। इसके लिए न सिर्फ़ मौजूदा विधियों का अद्यतन, बल्कि ग्रासरूट स्तर पर अभिभावक शिक्षण, सामाजिक जागरूकता अभियानों और तेज़ निरीक्षण तंत्र की जरूरत है। तभी ऐसी कई‑ध्रुवीय टिप्पणी को वास्तविक सामाजिक सुधार के प्रेरक बनाना संभव होगा, न कि बस एक उच्च-प्रोफ़ाइल उद्यमी के मंच पर चर्चा का विषय।
Published: May 8, 2026