एल्गोरिद्म‑आधारित शेड्यूलिंग से अस्थिर काम और आय में कटौती: घंटे‑वार कर्मचारियों पर दबाव
रिटेल, लॉजिस्टिक्स, कॉल‑सेंटर और खाने‑पीने की सेवाओं जैसे कई सेक्टरों में काम करने वाले घंटे‑वार कर्मचारियों को अब अपनी नौकरी के शेड्यूल और वेतन दोनों में लगातार उतार‑चढ़ाव का सामना करना पड़ रहा है। इन परिवर्तनों के मूल कारण के रूप में कंपनियों द्वारा अपनाए गए स्वचालित कार्य‑प्रबंधन सॉफ़्टवेयर को बताया जा रहा है, जिसके द्वारा तकनीकी एल्गोरिद्मों के माध्यम से लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की जाती है।
ऐसे सॉफ़्टवेयर अक्सर कर्मचारियों को कम नोटिस पर शिफ्ट बदलने, अचानक अतिरिक्त घंटे कम करने या अवकाश को रद्द करने का निर्देश देते हैं। परिणामस्वरूप कई कामगारों को अपने रोज़मर्रा के खर्चों के लिये जरूरी आय में कमी देखनी पड़ती है। महिला श्रमिकों, माइग्रेंट कामगारों और उन वर्गों पर विशेष प्रभाव पड़ता है, जिनकी आय पहले से ही सीमित होती है और जिनके पास वैकल्पिक रोजगार के विकल्प कम होते हैं।
इस समस्या की गंभीरता को लेकर भारत के श्रम मंत्रालय ने कई बार “समानता‑आधारित शेड्यूलिंग” के दिशानिर्देश जारी किए हैं, परन्तु कार्यान्वयन में देरी और निगरानी की कमी ने इन निर्देशों को केवल कागज़ी कार्रवाई तक सीमित रख दिया है। कुछ राज्य सरकारों ने कल्याणकारी नियमों का मसौदा तैयार किया है, जिसमें शिफ्ट बदलने के लिए न्यूनतम नोटिस अवधि और जमाकर्ता भुगतान की समय सीमा शामिल है, परन्तु अभी तक इनपर ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
न्यायालयों का प्रवाह भी इस मुद्दे पर अटक नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष “न्यायसंगत कार्यकाल” संबंधी परीक्षण के तहत कंपनियों को अनिवार्य रूप से पूर्व सूचना देने और ओवरटाइम का सही भुगतान करने का आदेश दिया था, परन्तु एल्गोरिद्म‑चालित शेड्यूलिंग को पहचानने के लिये स्पष्ट विधायी आधार की कमी अभी भी जमीनी स्तर पर कामगारों को असुरक्षित रखती है।
सार्वजनिक विमर्श में यह प्रश्न उठता है कि उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर तकनीकी स्वायत्तता को किस हद तक अनुमति दी जानी चाहिए। “डिजिटल दक्षता” का नारा अक्सर नीति-निर्माताओं की मीटिंग में सुना जाता है, परन्तु जब वही तकनीक कामगारों के जीवन‑स्तर को घटाती है, तो यह नारा व्यंग्यात्मक रूप धारण करता है।
सामाजिक असमानता को घटाने के लिये न केवल नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करना आवश्यक है, बल्कि कंपनियों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि एल्गोरिद्म केवल लागत‑कमी का साधन नहीं, बल्कि एक सामाजिक अनुबंध का भाग है, जहाँ कार्य‑समय की स्पष्टता और यथोचित वेतन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस दिशा में कड़ी निगरानी, स्वायत्त श्रमिक प्रतिनिधियों की भागीदारी और वास्तविक डेटा‑आधारित प्रमाण के बिना अल्पकालिक लाभों का पीछा नहीं किया जाना चाहिए।
Published: May 3, 2026