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एबीसी ने ट्रम्प सरकार पर अभिव्यक्ति स्वतंत्रता दमन का आरोप लगाया
संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रमुख सार्वजनिक प्रसारक एबीसी ने एक औपचारिक दायर में वर्तमान ट्रम्प प्रशासन को "स्वतंत्रता के अधिकार" को ठंडा करने का आरोप लगाया। यह विवाद "द व्यू" नामक टॉकशो को प्रसारण के समान‑समय (equal‑time) नियमों के दायरे में लाने की नीति से जुड़ा है, जिसे एबीसी ने बिना स्पष्ट कारण के लागू करने की कोशिश को सेंसरशिप के रूप में पेश किया।
आधारभूत प्रश्न यह है कि क्या एक निजी टॉक शो को सरकारी रूप से निर्धारित समान‑समय ढांचे में डालना सार्वजनिक विमर्श की विविधता को सीमित करता है या यह समतावादी प्रसारण पद्धति का एक वैध प्रयोग है। एबीसी का कहना है कि इस तरह का नियामक हस्तक्षेप न केवल संवैधानिक अभिव्यक्ति की सुरक्षा को कमजोर करता है, बल्कि नागरिकों को विविध विचारों तक पहुँचने के अवसर को भी घटाता है।
एबीसी ने इस कदम को प्रशासनिक लापरवाही का एक रूप कहा, जहाँ नीति‑निर्माण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और पक्षकारों की भागीदारी को नज़रअंदाज़ किया गया है। समान‑समय नियम अभी तक भारत जैसे लोकतंत्र में भी विवादास्पद रहे हैं; जहाँ कई बार ऐसी नीतियों को राजनीतिक दबाव और चयनात्मक कार्यान्वयन के माध्यम से सार्वजनिक हित से दूर ले जाया गया है।
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, ऐसी निर्णय‑शृंखलाएं अक्सर सामाजिक असमानता को और गहरा कर देती हैं। जब प्रमुख मीडिया मंचों को सरकार के अनुकूल रूप में पुनर्संरचित किया जाता है, तब कम आवाज़ वाले वर्ग—जैसे दलित, पिछड़ा वर्ग, महिला तथा अल्पसंख्यक—की दृष्टि मंच से बाहर हो जाती है। इस पर एबीसी ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता के दमन से सार्वजनिक निगरानी, शिक्षा‑संबंधी जानकारी के प्रसार तथा स्वास्थ्य‑संबंधी जागरूकता के भीतर भी बाधा उत्पन्न हो सकती है।
विपरीत रूप में, प्रशासन का तर्क अक्सर "समान अवसर" के नाम पर प्रस्तुत किया जाता है। हालाँकि, जब समान‑समय नियम का लागू होना केवल कुछ कार्यक्रमों तक सीमित रहता है, तो यह नीति‑फ़रार्गी बन जाती है। इस अति व्यवहार को सूखी व्यंग्यात्मक दृष्टि से देखकर ऐसा लगता है मानो लोकतंत्र को एक रंगीन स्क्रीन पर दिखाया जा रहा हो, पर खुद स्क्रीन के कंट्रोल बोर्ड को एक ही चैनल से चलाया जा रहा हो।
अंत में, एबीसी की शिकायत इस बात पर प्रकाश डालती है कि सरकार द्वारा सूचना‑मैत्री नीतियों को अपनाने में कितनी अनिच्छा और जवाबदेही की कमी है। यदि सार्वजनिक विमर्श को सच्ची स्वतंत्रता और विविधता से पोषित होना है, तो नीतियों को न केवल स्पष्ट रूप से परिभाषित, बल्कि सभी हितधारकों की सहभागिता के साथ लागू किया जाना चाहिए। यही भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक सीख है—जहाँ अभिव्यक्ति की रक्षा केवल कागजी अधिकार नहीं, बल्कि वास्तविक प्रशासनिक प्रतिबद्धता की माँग करती है।
Published: May 9, 2026