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एनिमिया को अंतर्निहित कारण बनता देखी गईं डिमेंशिया, स्वास्थ्य नीति पर सवाल
एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में बताया गया है कि रक्तहीनता (एनिमिया) और डिमेंशिया के बीच प्रत्यक्ष संबंध हो सकता है। यह खोज भारत की बढ़ती उम्र वाली जनसंख्या और महिलाओं में पोषण-संबंधी दुर्बलताओं को एक नए आश्चर्यजनक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।
एनिमिया ने वर्षों से राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रमों की प्राथमिकता रही है, विशेषकर गर्भवती महिलाओं, शिशु और स्कूल‑उम्र के बच्चों के लिए। लेकिन वृद्ध नागरिकों में इस रोग का प्रसार अनदेखा रहता है, जबकि वही वर्ग सबसे अधिक डिमेंशिया के जोखिम में है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल के अनुसार, लगभग 30 % महिलाओं और 20 % पुरुषों को कम हीमोग्लोबिन स्तर की पुष्टि हुई है। इन आंकड़ों को देखते हुए अब यह प्रश्न उठता है कि क्या मौजूदा पोषण योजनाएँ बुजुर्गों को पर्याप्त रूप से कवर कर रही हैं या केवल युवा वर्ग के ‘सही’ आँकड़े दिखाने पर केंद्रित हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में एनिमिया की नियमित स्क्रीनिंग को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के मूल कार्यों में शामिल किया गया है, फिर भी इसकी कार्यक्षमता कई जगहें ‘अधूरे फॉर्म‑फिलिंग’ तक सीमित दिखती है। अक्सर रक्त परीक्षण के बाद रिपोर्ट दो‑तीन हफ्ते में नहीं आती, जबकि डिमेंशिया के शुरुआती संकेतों की पहचान के लिए समय पर हस्तक्षेप आवश्यक होता है। इस पर प्रशासकीय दृष्टिकोण से टिप्पणी करना मुश्किल नहीं: “फ़ाइलों की गिनती तो सही है, पर फ़ाइलों के पीछे का काम कहाँ है?”
डिमेंशिया की देखभाल के लिये मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में लुड़कती हुई हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP) ने कई अध्यादेश जारी किए हैं, फिर भी एंटी‑डिमेंशिया दवाओं और स्मृति‑सुधार हेतु पोषण‑समर्थित हस्तक्षेपों की उपलब्धता अधिकांश सार्वजनिक अस्पतालों में ‘विकल्प‑विचार’ के रूप में ही रह गई है। इस त्रैणी—एनिमिया, डिमेंशिया, और अपर्याप्त स्वास्थ्य‑सेवा—समाज के आर्थिक बोझ को बढ़ा रही है, जबकि नीति‑निर्माताओं को ‘एक पन्ने के एडिटोर्ड लेटर’ से संतुष्ट किया जा रहा है।
समाधान के लिये एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है: पोषण कार्यक्रमों में बुजुर्ग वर्ग को स्पष्ट रूप से सम्मिलित करना, प्राथमिक स्तर पर रक्तहीनता की शीघ्र पहचान और उपचार सुनिश्चित करना, तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को एनिमिया‑डिमेंशिया रोकथाम के साथ जोड़ना। केवल तभी नीति‑निर्माताओं के वादे से अधिक, वास्तविक स्वास्थ्य‑सुरक्षा की ठोस प्रतिज्ञा को धरातल पर उतारा जा सकेगा।
Published: May 7, 2026