एक तिहाई एचआर नेता एंट्री, विविधता और समावेशी योजना पर प्रतिरोध का सामना
एक नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार, एचआर निर्णय‑निर्माताओं में से लगभग एक तिहाई ने पिछले साल में समावेशी (EDI) पहलों के विरोध का सामना किया। यह परिणाम, जो राष्ट्रीय रोजगार चैरिटी Working Chance द्वारा आयोजित किया गया, 565 एचआर पेशेवरों की राय पर आधारित है।
सर्वेक्षण ने विशेष रूप से यह उजागर किया कि दंडित (कन्विक्शन) लोगों को नौकरी दिलाने के लिए किये गये प्रयासों को अक्सर अंदरूनी बुरी मान्यताओं और बाहरी दबावों द्वारा बाधित किया जाता है। परिणामस्वरूप, उन व्यक्तियों की रोजगार‑संधियों की संभावनाएँ कम हो रही हैं, जो सामाजिक पुनर्वास की नीति‑परिपत्रित अपेक्षाओं के विपरीत है।
भारत में इस मुद्दे के असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जेल‑बाद जेल पुनर्वास कार्यक्रम, कौशल विकास पहलें और ‘रोज़गार के अवसर’ के नाम पर सरकारी अधिनियम मौजूद हैं, पर उनका कार्यान्वयन अक्सर अधूरी नीति‑संकल्पना और स्थानीय प्रशासन की अनिच्छा के कारण ठहर जाता है। जहाँ सरकार ने “भवन पुनरुत्थान” पर संकल्प लिया, वहीं एचआर विभागों में प्रतिरोध ने वही “बिल्डिंग को कंक्रीट” का नाटक कर दिया।
समाज के सबसे कमजोर वर्ग—जिन्हें पुनः समाज में लौटना है—इन नीतियों के बुनियादी लाभार्थी बनना चाहिए था। लेकिन एचआर में असमानता, इनाम‑विनियम (क्वालिफिकेशन्स) के दृढ़ ढांचे और “सुरक्षा” को ढालते हुए स्थायी पूर्वाग्रह ने उनके पुनर्स्थापन को दीर्घकालिक अड़चन बना दिया है। यह न केवल व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता को भी घटाता है।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया के तौर पर, कई राज्य सरकारें “इन्क्लूज़न एक्ट” पर कार्यवाही शुरू कर रही हैं, पर उनका शब्द‑संकल्पनात्मक रूप अधिकांशतः कागज़ पर ही रहता है। नीति‑निर्माताओं की बैठक‑बोर्डरूम में किए गये वादे, और जमीनी स्तर पर एचआर नेताओं द्वारा अनुभव किए गये प्रतिरोध, बीच में एक निरंतर फासला पैदा कर रहे हैं। इस असंतुलन को देखते हुए, कई सामाजिक संगठनों ने “पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी” की माँग की है, पर अभी तक कोई ठोस निगरानी प्रणाली स्थापित नहीं हुई।
ब्रोडबैंड, स्वास्थ्य, शिक्षा—जिन बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता सामाजिक असमानता को कम करती है—उनकी कमी से वैकल्पिक रूप से यह स्थिति और बिगड़ती है। जब कार्यस्थल में विविधता को लेकर विरोधी आवाज़ें तेज़ी से उठती हैं, तो यह संकेत देता है कि नीति‑निर्माण सिर्फ कागज़ी औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं बचा। वही पुनर्वास लाभार्थी, जो सामाजिक सुरक्षा जाल की आशा करते हैं, अब लक्षित असमानता के आग में धँस रहे हैं।
जब सरकार “समावेशी विकास” की ओर उँगली उठाती है, तो एचआर के भीतर की धुंधली प्रतिरोधी भावना के सामने वह उँगली हवा में ही झूलती लगती है। इस असंगति पर एक ही बात कहा जा सकता है: नीति दलालित, कार्यान्वयन असफल, और प्रभावित वर्ग को फिर से दोहराए जाने वाले “क़ानूनी धोखे” का मुंह देखना पड़ता है।
समाज का यह बेताब प्रश्न बना रहता है—क्या वास्तव में समावेशी रोजगार के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा, या सिर्फ शब्द‑खेल के पीछे छिपे डर को ही सत्य मान लिया जाएगा? उत्तर तभी स्पष्ट होगा, जब प्रशासन अपने स्वयं के विरोध को भी स्वीकार कर, नीतियों को धरातल पर वास्तविक बनाते हुए, उन लोगों को सच्ची रोजगार‑सुरक्षा प्रदान करेगा, जिन्हें वास्तव में एक नई शुरुआत की जरूरत है।
Published: May 3, 2026