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Category: समाज

एक टिप्पणी ने बदली लेखकों की ज़िन्दगी: स्कूल में भेदभाव और नीति‑असफलता की कहानी

कई लेखकों ने हाल ही में बताया कि कैसे एक साधारण शिक्षकीय टिप्पणी ने उनके जीवन के मार्ग को बदल दिया। 1980 के दशक के अंत में, एक किशोर छात्र को इतिहास के शिक्षक ने "विशेष आवश्यकता वर्ग" में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया। उस समय का शैक्षिक ढाँचा दोधारी खून की तरह काम करता था – या तो आप ‘सामान्य’ हो या ‘विशेष आवश्यकता’ का टैग मिल जाता था। इस वर्गीकरण ने न केवल छात्र की आत्म‑सम्मान को धूमिल किया, बल्कि उसकी शैक्षणिक आकांक्षाओं को भी धूमिल कर दिया।

ऐसी ही टकराव की कहानियाँ भारत में भी सुनवाई जा रही हैं। स्कूलों में अक्सर अतिरंजित टिप्पणीें, बिना उचित मूल्यांकन के, छात्रों को विशेष शिक्षा वर्ग में धकेल देती हैं। ऐसी निर्णय‑प्रक्रिया न केवल शैक्षिक समानता के सिद्धांत को तोड़ती है, बल्कि सामाजिक कलंक को भी गहरा करती है। कई बार तो यह टिप्पणी केवल ‘बोरियों को दूर करना’ या ‘क्लासरूम प्रबंधन आसान बनाना’ के नाम पर दी जाती है, जबकि असली कारण विद्यार्थी की विविध क्षमताओं को समझने में संस्थागत असफलता है।

वहीं, प्रशासकीय प्रतिक्रिया भी अक्सर शब्दों की शक्ति को नज़रअंदाज़ करने की ही राह चुनती है। जब ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट आती है, तो बोर्ड केवल ‘विचार‑विमर्श’ या ‘संवेदनशीलता प्रशिक्षण’ का उल्लेख करके मुद्दे को सतही तौर पर सुलझा देता है। वास्तविक सुधार के लिए आवश्यक नीतियों – जैसे समावेशी शिक्षा हेतु स्पष्ट मानदंड, प्रशिक्षित काउंसलर की उपलब्धता, और वर्गीकरण पर स्वतंत्र मूल्यांकन – अभी भी कागज़ी औपचारिकताओं में फँसी हुई हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार की लैंगिक‑स्तर, आर्थिक‑स्तर, और शारीरिक‑मानसिक असमानताएँ सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती हैं। छात्रों को ‘अलग होने’ का टैग मिलने से उनका आत्मविश्वास घटता है, जिससे डिप्रेशन, घबराहट, और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस अंतर्निहित तनाव को रोकने के लिए कम से कम दो दशकों से वांछित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुच्छेद 12‑b को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है।

व्यंग्य यह है कि जबकि नीति‑निर्माता ‘समावेशी शिक्षा’ के बड़े बैनर ताने, वास्तविकता में क्लासरूम में समानता की कोई ठोस योजना नहीं मिलती। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक निरंकुशता और उत्तरदायित्व की कमी, नागरिकों के शब्द‑संकल्पनात्मक अधिकारों को कितनी आसानी से दबा देती है। लेखकों की ज़िन्दगी में मोड़ लाने वाली वह तुच्छ टिप्पणी, अंततः हमारी शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों का पर्दाफ़ाश करती है – जहाँ शब्दों को बियाणे के रूप में बोझिल नियमों के नीचे दबा दिया जाता है।

Published: May 3, 2026