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Category: समाज

उड़ते मेंढक के बच्चे का मल जैसा रंगन, बायोडायवर्सिटी नीति की चुप्पी पर सवाल

हाल ही में जैव वैज्ञानिकों ने दिखाया कि वॉलेस के उड़ते मेंढक के जुवेनाइल, जिनके लाल‑सफ़ेद धब्बे मल जैसा दिखते हैं, शिकारी पक्षियों को भ्रमित करके अपनी जान बचाते हैं। यह अनोखा क्यूम्युलिशन रणनीति प्राकृतिक प्रतिरक्षा का एक शानदार उदाहरण है, परन्तु भारत में इस तरह की वैज्ञानिक खोजों को समर्थन देने वाली नीति‑परिचालन प्रणाली कब तक मौन रहेगी?

जर्नल में प्रकाशित अध्ययन से पता चला कि समान रंग‑रूप वाले मॉडल पक्षियों द्वारा कम ही हमले सहते हैं। इसका अर्थ यह है कि छोटे‑छोटे जीव अपने अस्तित्व के लिए पर्यावरणीय ‘छद्म‑रक्षा’ का प्रयोग करते हैं, जबकि बड़े‑पैमाने पर इस ज्ञान को लागू करने के लिए आवश्यक समर्थन ही नहीं मिलता। राष्ट्रीय वन्यजीव नीति में बायोडायवर्सिटी संरक्षण के नाम पर कई करोड़ रुपये आवंटित किए जाने की बात अक्सर सुनी जाती है, परंतु वास्तविक जमीन पर शोध‑स्थल, प्रशिक्षण‑सुविधा और स्थानीय स्कूल‑कॉलेजों में जैव विविधता शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा कहीं नहीं मिलता।

राष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ कृषि‑उत्पादकता सीधे पर्यावरणीय स्वास्थ्य से जुड़ी है, इस तरह के बायो‑इनोवेशन का उपयोग कीट‑नियंत्रण या जल‑संरक्षण में प्रभावी हो सकता था। परंतु प्रशासनिक लापरवाही से फंड का ‘डिस्पैशन’ अक्सर बाग‑बगीचे जैसे बड़े‑पैमाने के ज़बाबदार प्रोजेक्ट्स में ही रहता है, जबकि माइक्रो‑इको‑इकॉलॉजी शोध को जमीन‑से‑साइड पर अनदेखा किया जाता है। इस अनौपचारिक ‘उड़ान’ के पीछे सरकार की मौखिक प्रतिबद्धताओं के साथ‑साथ कार्य‑निष्पादन के अंतर को दिखा रहा है।

विद्याविभाग में भी इस खोज को पाठ्यक्रम में शामिल करने की कोई पहल नहीं देखी गई। अगर स्कूल‑कॉलेजों में छात्रों को इस प्रकार की अनुकूलन‑शास्त्र के बारे में बताया जाता, तो पर्यावरणीय संवेदनशीलता और भविष्य की वैज्ञानिक क्षमताओं में वृद्धि होती। वर्तमान में, ‘पर्यावरण शिक्षा’ का नाम अक्सर दिया जाता है, परन्तु वस्तुस्थिति में वह केवल ‘परीक्षित पुस्तकों’ तक सीमित रहता है, जबकि वास्तविक‑जीन‑सक्रिय दृष्टिकोण की ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

निचले स्तर पर, गाँव‑कोष में बायोडायवर्सिटी‑आधारित रोजगार सृजन योजना की कमी से नाबालिगों को रोजगार के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। इस प्रकार की अनूठी जीव‑विज्ञान खोजें स्थानीय पर्यटन, सामुदायिक‑आधारित संरक्षण और छोटे‑उद्यमी पहल में भी रचनात्मक प्रयोग का आधार बन सकती थीं, परन्तु नीति‑प्रक्रिया की ‘सरकारी-अडिग्मा’ ने इन संभावनाओं को ‘अदृश्य’ बना दिया।

सारांश में, वॉलेस के उड़ते मेंढक के ‘मल‑नकली’ रंगन से यह सिद्ध होता है कि प्रकृति ने स्वयं जटिल सुरक्षा तंत्र विकसित कर रखा है। अब सवाल यह नहीं कि यह कैसे काम करता है, बल्कि यह है कि देश की अभियांत्रिक‑प्रशासनिक प्रणाली इस प्राकृतिक ज्ञान को सार्वजनिक लाभ, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के साधन में बदलने में कब तक लापरवाह बनी रहेगी। समय ने कहा है, ‘जैसे मेंढक ने अपना रंग बदल दिया, वैसे ही नीति को भी बदलना चाहिए’, परन्तु वर्तमान में चुप्पी ही सबसे बड़ी चापलूसी बन कर रह गई है।

Published: May 4, 2026