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उक्रेन में रूसी सेना के 35,000 से अधिक हताहत — भारत में मानवीय जवाबदेही की जाँच की जरूरत
इंटेलिजेंस एंड स्ट्रैटेजिक वर्क्स (ISW) के नवीनतम विश्लेषण के अनुसार, मस्को की सैन्य अग्रिम गति में धीरे‑धीरे गिरावट देखी जा रही है। यूक्रेन की सेना ने अप्रैल में रूसी बलों को 35,000 से अधिक जांघों, अंगों और जीवन की हानि का आँकड़ा पेश किया, जिससे युद्ध क्रम में पहले से ही बड़ी मानवीय त्रासदी उजागर हो रही है।
यह आँकड़ा केवल सैनिकों की मौत नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य सेवा, पुनर्वास और मनोवैज्ञानिक समर्थन की निकट‑भविष्य में बढ़ती माँग को भी दर्शाता है। भारतीय राजनयिक और मानवीय एजेंसियों के लिए यह प्रश्न उठता है कि विदेश में इस तरह की बिनाबाबील एहतियातों के सामने वह किस हद तक तैयारी कर रही है। एक बार फिर स्वास्थ्य नीति‑निर्माताओं, आयुर्वेदिक और एंज्योइंट्रेंस सेंटर्स को अंतरराष्ट्रीय आपदाओं की सटीक जानकारी प्रदान करने में असफलता की याद आती है।
देश में कई गैर‑सरकारी संगठनों ने तुरंत राहत कार्य शुरू करने की पुकार लगाई है, परन्तु केंद्रिय प्रशासन के पास उक्रेन जैसी दूरस्थ संकट पर त्वरित निधी आवंटन या एकीकृत सहायता योजना का अभाव स्पष्ट है। ऐसा प्रतीत होता है कि विदेश में हो रहे बड़े मानवीय नुकसान के सामने घरेलू स्वास्थ्य‑सुविधा, शिक्षा‑सामान और नागरिक सुरक्षा के मुद्दों पर बजट कटौतियां जारी हैं। यहाँ प्रशासकीय उपेक्षा का एक सूखा व्यंग्य उभर कर आता है: “दूर के मैदान में रक्त‑रंजित धरती को देखते ही, हमारे अपने अस्पतालों की बकाया बुनियादी उपकरण मरम्मत की सूचियाँ क्यों नहीं हटतीं?”
कक्षा‑खाली, रोग‑एंड‑रोकथाम अभियानों की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपस्थिति, इन सब को अभी‑अभी उठाए गए अंतरराष्ट्रीय आँकड़ों से नई दृष्टि मिलती है। यदि विदेश में 35,000 सैनिकों की क्षति को राष्ट्रीय सुरक्षा की मानकों के तौर पर मान्य किया जाता है, तो उसी मानक पर घर के भीतर बीमार बच्चों, शिक्षित युवा और वृद्ध नागरिकों के लिए नीति‑निर्माण क्यों नहीं किया जाता?
इस संदर्भ में, भारत की नीति निर्माताओं को न केवल अंतरराष्ट्रीय मानवीय दायित्वों को समझना होगा, बल्कि अपने भीतर की सामाजिक असमानताओं, स्वास्थ्य‑शिक्षा‑सुविधा के अंतर को भी सुलझाना होगा। एक सच्ची जवाबदेही तभी संभव हो सकती है, जब दरबार‑नुमा कागज़ी विज्ञप्तियों से अधिक concrete कदम उठाए जाएँ, जैसे कि संघर्ष‑क्षेत्र में शरणार्थियों के लिये शीघ्र वैद्यकीय कार्ड जारी करना, या अगली बार जब किसी विदेशी भूमि में मानवीय संकट उभरे, तो भारत की सहायता योजना ‘सुरक्षा प्रथम, स्वास्थ्य द्वितीय' के सिद्धांत पर आधारित हो।
Published: May 8, 2026