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Category: समाज

ईवरेस्ट बेस कैंप पर भरतनाट्यम 'पायदान' बना: महिला माउंटेनियर सानिका शाह की व्यक्तिगत प्रार्थना

एक अद्भुत मिश्रण ने विश्व को चकित किया—भारतमयी ताली से गूँजते ऊँचे हिमशिखर की शांत शुद्धता। 28‑वर्षीया सानिका शाह, जिसने कई बार हिमालय के कठिन आरोहण पर क़दम रखा, ने अपने जीवन की दीर्घकालिक इच्छा को पूरा किया: ईवरेस्ट बेस कैंप की बर्फीली भूमि पर भरतनाट्यम का आरंभिक अंश प्रस्तुत करना। यह नृत्य, जो वह स्वयं को आध्यात्मिक प्रार्थना और व्यक्तिगत अनुष्ठान मानती हैं, सोशल मीडिया पर वायरल हो कर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।

शाह के इस कदम को केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को ऊँचाइयों पर ले जाने की दिशा में एक सामाजिक संकेत माना जा रहा है। हालांकि, इस प्रेरणादायक अभिषेक को देखते हुए भी कई प्रश्न सामने आते हैं—विशेषकर उन नीतियों का, जो खेल‑कला के संगम को सुदृढ़ बनाने में असफल रही हैं।

पहले, महिला माउंटेनियरों को मिलने वाली सरकारी सहायता का परिदृश्य पर‍्याप्त नहीं है। केंद्र तथा राज्य स्तर पर स्थापित ‘खेल‑संस्कृति’ निधि तो मौजूद है, परंतु उसके वितरण में अक्सर जटिल प्रोटोकॉल और लंबी मंजूरी प्रक्रिया बाधा बनती है। सानिका ने स्वयं बताया कि उन्होंने अपनी इस यात्रा को वित्तपोषित करने के लिए निजी प्रायोजकों और स्वयं की बचत पर भरोसा किया, जबकि समान अवसर पाने वाले कई सहकर्मी अब भी मान्यताओं और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।

दूसरे, भारत में क्लासिकल कला के प्रचार‑प्रसार के लिए मौजूदा नीति‑परिधान बहु‑क्षेत्रीय समन्वय की कमी दर्शाता है। न तो पर्यटन विभाग और न ही खेल मंत्रालय ने इस तरह के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व को एकीकृत करने का स्पष्ट प्रोटोकॉल तैयार किया। परिणामस्वरूप, ऐसे पहल अक्सर व्यक्तिगत पहल पर निर्भर रह जाती हैं, जिससे प्रशासनिक उदासीनता का संकेत मिलता है।

तीसरे, स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से भी प्रश्न उठते हैं। बेस कैंप पर नृत्य जैसी शारीरिक गतिविधि का समर्थन करने हेतु उचित चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था नहीं थी। हिमालयीय क्षेत्रों में उच्च ऊँचाई के कारण श्वसन व हृदय संबंधी जोखिम बढ़ते हैं, परन्तु इस तरह के प्रयासों को मान्यता देने वाले कोई मानक दिशानिर्देश नहीं हैं। यह मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के अंतर को उजागर करता है, जहाँ सक्रिय जीवनशैली को प्रोत्साहित करना कहा जाता है, परन्तु उन्नत शारीरिक चुनौतियों के लिए बुनियादी ढाँचा अधूरा रहता है।

इन सबके बीच, सामाजिक मीडिया ने इस घटना को सराहते हुए भारत के विविध सांस्कृतिक जड़ों की पहचान को नई ऊँचाइयों पर ले जाने की आशा व्यक्त की। कई नागरिकों ने उल्लेख किया कि अगर सरकार ऐसी प्रेरणादायक कदमों को प्रणालीगत समर्थन देती, तो न केवल युवा वर्ग बल्कि ग्रामीण एवं पृष्ठभूमि‑वर्गीय महिलाओं को भी अवसर मिलेंगे।

संक्षेप में, सानिका शाह की ईवरेस्ट‑बेस कैंप पर भरतनाट्यम प्रस्तुति केवल एक व्यक्तिगत गर्व नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक‑आर्थिक संरचना में खेल‑कला के समन्वय की कमी को उजागर करने वाला एक चेतावनी संकेत है। नीति‑निर्माताओं को अब इस उत्सव को स्थायी ढाँचे में बदलने की जरूरत है—ताकि अगली पीढ़ी न सिर्फ शिखर चढ़े, बल्कि अपने सांस्कृतिक पांवों की ध्वनि भी गूँजते हुए उस शिखर को छू सके।

Published: May 3, 2026