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Category: समाज

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इज़राइल के हमले में गाज़ा में हामास नेता के पुत्र की मौत, नागरिकों की दुर्दशा पर प्रश्न

गाज़ा पट्टी में इज़राइल द्वारा किए गये एक वायु हमला में हामास के वरिष्ठ नेता खलील अल-हय्या के बेटे अज़्ज़ाम की मौत हो गई, यह बात हामास के वरिष्ठ प्रखर बासेम नाइम ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में पुष्टि की। इस घटना ने न केवल एक राजनीतिक परिवार को शोक में घेरा, बल्कि मौजूदा मानवीय संकट को और गहरी लकीरें खींच दी हैं।

गाज़ा में स्वास्थ्य सुविधाएँ पहले से ही अत्यधिक बोझिल हैं। कब्ज़े वाले क्षेत्र में अस्पतालों की बुनियादी आवश्यकताओं की कमी, फंसे हुए मानव शरीर के लिए पर्याप्त बिस्तर न होना, और अक्सर दवाओं की घुसपैठ‑रोक नीति के कारण दवाओं का अभाव एक सामान्य बात बन चुका है। अज़्ज़ाम के शव को प्राप्त करने वाले डाक्टरों को बुनियादी जीवनरक्षक उपकरणों की भी कमी का सामना करना पड़ा, जिससे यह प्रश्न उठता है कि कब तक आम नागरिकों को 'रक्षा' के नाम पर इस तरह के बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जाएगा।

शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति और अधिक नाज़ुक है। कई स्कूलों को बमबारी के कारण विस्थापित किया गया है या फिर उन्हें सैन्य उपयोग के लिये ले जाया जाता है। बच्चों को न केवल पढ़ाई से वंचित किया जा रहा है, बल्कि निरंतर विस्थापन उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी क्षति पहुँचा रहा है। ऐसी असमानता का प्रतिदिन गवाह बनने वाले बच्चों के उज्ज्वल भविष्य में कौन‑सी आशा बची है?

हालांकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई देश इस हमले की निंदा करते हैं, लेकिन वास्तविक नीति‑निर्माण में अक्सर दायित्व की पहचान ही नहीं होती। इज़राइल की रक्षा‑नीति को यदि आपराधिक निर्तन में बदलने की अनुमति देती है, तो यह प्रश्न उठता है कि अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली के पास इस तरह की नीति‑भूल को रोकने का क्या उपाय है। इसी तरह, तुर्की‑फ़िलिस्तीन में दीर्घकालिक मानवीय सहायता के बहाने पर अक्सर तत्काल राहत कार्यों की निर्लतापूर्ण अड़चनें बनी रहती हैं।

भारतीय जनता को भी इस ख़बर में अपना ध्यान देना चाहिए। गाज़ा में रहने वाले कई भारतीय प्रवासी कामगार और शरणार्थी मौजूद हैं, जिनकी सुरक्षा संबंधी उपायों की स्पष्ट जानकारी अभी तक नहीं मिली है। सरकार द्वारा विदेश‑नीति के परिप्रेक्ष्य में मानवीय सहायता के आयोग को सक्रिय कर, अनिवार्य मानवीय पासपोर्ट जैसी त्वरित व्यवस्था की आवश्यकता है, वरना नागरिकों के लिए यह संकट सिर्फ दो-तीन महीनों का नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक असुरक्षा का मामला बन सकता है।

समाज के निचले वर्ग के लोगों की पीड़ा को देखते हुए, प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल और भी ज़्यादा गहरा हो जाता है। स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी जीवन‑सुविधाओं की उपेक्षा को केवल 'सुरक्षा कारण' के नाम से सही ठहराना अब असहोयनीय हो गया है। नीति‑निर्माताओं को अब समझना होगा कि सच्ची सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि लोगों के जीवन की रक्षा से आती है।

Published: May 7, 2026