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Category: समाज

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इंडोनेशिया में निकेल खनन की बढ़ती क्षति: स्वास्थ्य‑पर्यावरण जोखिम और नीति विफलता

इंडोनेशिया के छह प्रमुख निकेल उत्खनन केंद्रों में स्थानीय लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बड़ा परिवर्तन आया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, खनन उद्योग ने रोजगार के अवसर सृजित किए हैं, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरणीय गिरावट और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर नज़र न रखने वाले प्रबंधन के संकेत भी साफ़ दिख रहे हैं।

खानों के निकट रहने वाले ग्रामीण परिवार अब कच्चे धातु के निकेल के धुएँ से उत्पन्न सूक्ष्म कणों से प्रभावित हो रहे हैं। कई गृहस्थियों ने लगातार खांसी, सांस की तकलीफ़ और त्वचा पर जलन की शिकायत की है। स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों से मिलने वाले बुनियादी उपचार भी इन समस्याओं को ठीक करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं, जिससे रोगियों को शहर के बड़े अस्पतालों तक प्रवास करना पड़ता है।

पर्यावरणीय पहलुओं पर नज़र डालें तो नदी की सतह पर भारी मात्रा में निकेल मिल्क की जमा हो गई है, जिससे मछलियों की जनसंख्या में गिरावट आई है और पेयजल की गुणवत्ता में उल्लेखनीय गिरावट आई है। किसानों ने बताया कि अब नदियों में से निकले जल से खेती करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि फसलें अक्सर अनजाने में धातु‑जोड़ वाले पानी में उगती हैं।

इन समस्याओं के बावजूद प्रशासनिक प्रतिक्रिया धीरे‑धीरे और अक्सर अस्थायी उपायों तक सीमित रही। स्थानीय प्राधिकरणों ने ‘पर्यावरणीय निगरानी रिपोर्ट’ जारी कर कहा कि निकेल कंपनियों ने पुनरावर्तन योजना तैयार कर ली है, परंतु इन योजनाओं के कार्यान्वयन के ठोस आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कई गांवों ने अभी तक कानूनी प्रावधान के तहत उचित पुनर्वास निधि नहीं पाई है, जिससे आर्थिक असमानता और बढ़ती हुई निराशा स्पष्ट हो रही है।

भारत के निकेल‑जैसे अन्य धातु खननों से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए यह केस एक स्पष्ट चेतावनी देता है। दोनों देशों में नीति‑निर्माताओं को पर्यावरणीय मानकों को सख़्ती से लागू करने, सतत विकास के लिये जमीनी स्तर पर निगरानी स्थापित करने और प्रभावित जनसंख्या को स्वास्थ्य एवं सामाजिक लाभ पहुँचाने के लिए त्वरित कदम उठाने चाहिए। नहीं तो रोजगार के अल्पकालिक लाभ के पीछे दीर्घकालिक सामाजिक क्षति को नजरअंदाज़ करना लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का बड़ा उल्लंघन बन जाएगा।

Published: May 7, 2026