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इंडोनेशियाई जलगांव तोरोजिए में मैनग्रोव ने स्थानीय मछुआरों को नई सहारा दिया
संध्याकाल में एक जल‑टैक्सी ने मोलेक्का सागर के किनारे स्थित तोरोजिए गांव को घुमाते‑घुमाते अपनी राह बदली। रंग‑बिरंगे पाइलट घर, जो जल के ऊपर खड़े हैं, न केवल दृश्य को मनोहारी बनाते हैं, बल्कि यहाँ की जनजीवन की जटिलता को भी उजागर करते हैं। इस स्थायी जलगांव की मुख्य आय मछली पकड़ना है, जो अधिकांशतः स्वदेशी समुदाय के पारम्परिक तरीकों से की जाती है।
हाल के वर्षों में मैनग्रोव, यानी मैन्ग्रोव वनों, ने यह समुदाय अपनी आजीविका की नई निर्धारिती के रूप में देखा है। ये जलेबी‑जैसे रूट‑वृक्ष समुद्री जल को स्थिर रखते हैं, लहरों से उत्पन्न कटाव को रोकते हैं और युवा मछलियों के प्रजनन स्थल प्रदान करते हैं। परिणामस्वरूप, मछुआरों को समुद्र की शिकार में स्थिरता मिलती है, जबकि जल निकासी की प्राकृतिक प्रक्रिया से स्वास्थ्य जोखिम—जैसे जलजनित रोग—की संभावना घटती है।
लेकिन इस पर्यावरणीय सहारे के बावजूद, स्थानीय प्रशासन की ओर से ठोस समर्थन की कमी बनी हुई है। कई वर्षों से चल रहे मैनग्रोव पुनर्स्थापन कार्यक्रमों को अक्सर निधियों की कमी, अनियमित निगरानी और जमीनी स्तर पर जागरूकता अभाव का सामना करना पड़ता है। आधे ही मैनग्रोव कटाव के जोखिम में हैं, जबकि सरकारी रिपोर्टें “सफलता की कहानी” कहकर इसे ढंक देती हैं। यह वही व्यंग्यात्मक समझौता है, जहाँ नीति‑निर्माता जल‑स्रोत के संरक्षण को ‘पर्यटन’ के ढाँचे में दिखाते हैं, जबकि जीवन‑रक्षा की वास्तविक जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं।
भारत में समान जल‑गांवों की स्थिति को देखते हुए, यह उदाहरण स्पष्ट रूप से प्रश्न उठाता है: क्या हमारे तटीय क्षेत्रों में भी मैनग्रोव के महत्व को पर्याप्त रूप से पहचाना गया है? क्या शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थाओं ने इन समुदायों को जल‑वायु परिवर्तन के प्रति तैयार किया है? उत्तर सरलीकृत नहीं है, परन्तु यह निश्चित है कि नीति‑कार्यान्वयन में देरी और प्रशासनिक उदासीनता ही असमानता को गहरा करती है।
तोरोजिए के मछुआरों के लिए अब दो विकल्प बचते हैं—या तो मैनग्रोव के सहारे को सुदृढ़ करने वाले सहयोगी नवाचारों को अपनाएँ, जैसे समुदाय‑आधारित वानिकी और जल‑सुरक्षा प्रशिक्षण, या फिर आगे के आर्थिक संकट का सामना करें। प्रशासन को न केवल निधि आवंटन को तेज़ करना चाहिए, बल्कि स्थानीय आवाज़ों को योजना‑निर्माण में समावेशी बनाकर नीति की कार्यक्षमता को वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ना चाहिए। जब तक “सत्रह वर्ष के विकास योजना” शब्द सिर्फ कागज पर ही रहता है, मैनग्रोव के पत्ते भी अनदेखी की धूप में झड़ते ही रहेंगे।
Published: May 6, 2026