इंग्लैंड में नई कैंसर इम्यूनोथेरेपी दवा से हजारों रोगियों को मिलेगा तेज़ इलाज, भारत में नीति‑गति की चुनौती
इंग्लैंड के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) ने हाल ही में घोषणा की कि अब सालाना हजारों कैंसर रोगियों को पेम्ब्रोलिज़ुमैब की नई इन्जेक्टेबल रूप‑रेखा से लाभ होगा। यह दवा, जो दो मिनट से भी कम समय में लगाई जा सकती है, पीडी‑1 नामक प्रोटीन को ब्लॉक कर रोग प्रतिरक्षा को कैंसर कोशिकाओं पर पुनः केंद्रित करती है। इस प्रकार इम्यून सिस्टम को ‘ब्रेक’ से मुक्त कर कैंसर को मारने का अवसर मिलता है।
विज्ञान और तकनीक के इस उन्नति से इंग्लैंड में उपचार की पहुँच में तेजी आएगी, परन्तु इस सफलता से उत्पन्न सवाल भारत की स्वास्थ्य नीतियों पर भी चमकते हैं। हमारे देश में कैंसर की दर निरन्तर बढ़ रही है, जबकि उपचार के लिए आवश्यक बायोटेक‑आधारित दवाओं की उपलब्धता फिर भी असमान है। सरकारी अस्पतालों में बुनियादी रेडियोथेरेपी और सर्जरी तो उपलब्ध हैं, पर आधुनिक इम्यूनोथेरेपी जैसे पेम्ब्रोलिज़ुमैब की पहुँच अभी भी सीमित वर्ग तक ही सीमित है।
नए उपचार की लागत, पेटेंट‑संबंधी प्रतिबंध और भारत में आयुर्विज्ञान अनुसंधान के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा अभी भी कई मायनों में कारवां के पहियों को रोकता आया है। नीति‑निर्माताओं ने हाल ही में ‘कैंसर पर राष्ट्रीय योजना’ का हवाला दिया, लेकिन वह योजना अक्सर बजट अधिनियम में खोती है या ‘क्लिनिकली वैधता के इंतजार में’ उलझी रहती है। इस मध्यस्थता में, रोगी ही फायदा नहीं उठाते, बल्कि उनका मनोबल भी घटता है।
इंग्लैंड की इस पहल से यह स्पष्ट होता है कि जब प्रशासन समय‑स्मार्ट इन्जेक्शन तकनीक को अपनाता है, तो रोगी संख्याओं में वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है। वहीं भारत में, कई राज्यों में वही पुरानी प्रोटोकॉल चलती रह जाती हैं: बुनियादी उपचार के लिए लंबी कतारें, महंगे विदेशी दवाओं के लिए निजी अस्पतालों में उच्च कीमतें, और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में निरूपयोगी ब्रीफ़िंग। इस असमानता को दूर करने के लिये न केवल बजट आवंटन बल्कि स्पष्ट, कार्यान्वित नीति‑मार्ग की आवश्यकता है, जो पेटेंट‑लाइसेंसिंग में सख्त नियम और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन दे।
नीतियों की इस गति‑रहित स्थिति पर व्यंग्यात्मक रूप से कहें तो, ‘समय बचाने की दवा तो इंग्लैंड ने विकसित की, पर यहाँ समय पर स्वास्थ्य नीति बनाने की दवा अभी भी प्रयोगशाला में ही है’। आशा है कि इन अंतरराष्ट्रीय सफलताओं से भारतीय स्वास्थ्य प्रशासन को प्रेरणा मिलकर, समान उपचार को राष्ट्रीय स्तर पर सुलभ बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता के बारे में गंभीरता से सोचने के लिये प्रेरित करेगा।
Published: May 4, 2026