जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

आल्जाइमर रोगी निदान में देरी से प्रयोगात्मक उपचार से वंचित

भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में अल्ज़ाइमर रोग के निदान की धीमी गति ने रोगियों को संभावित प्रयोगात्मक उपचारों से वंचित कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, अल्ज़ाइमर रोग की शुरुआती पहचान न केवल रोग की प्रगति को धीमा करती है, बल्कि रोगियों को नवीनतम क्लिनिकल ट्रायल में भाग लेने का अवसर भी प्रदान करती है। लेकिन अभी तक अधिकांश रोगी देर से पहचान या अस्पष्ट निदान के कारण इन अवसरों से वंचित हैं।

पिछले वर्ष में भारत में अल्ज़ाइमर और अन्य डिमेंशिया मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दवा परीक्षणों की संख्या अभूतपूर्व ऊँचाई तक पहुँच गई है। फिर भी, भारतीय रोगियों की भागीदारी की संख्या बहुत कम है। इस असंगति के पीछे कई कारण हैं:

इस स्थिति पर स्वास्थ्य प्रशासन की प्रतिक्रियाएँ अक्सर शब्दों में ही सीमित रह जाती हैं। “डिज़ीटली सुलभ निदान मंच” जैसी पहलों का उल्लेख किया जाता है, पर व्यावहारिक रूप से इनका कवरेज बहुत सीमित है। जबकि दवा कंपनियों ने इस साल ही विश्व स्तर पर अल्ज़ाइमर क्लिनिकल ट्रायल के रिकॉर्ड तोड़ दिया, भारत में समान अवसरों का दायरा अभी भी बहुत संकीर्ण है।

संतुलित नीति‑निर्माण की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में न्यूरो‑सर्विसेज का अभाव स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य प्रणाली की अपर्याप्तता को उजागर करता है। यदि रोगियों को देर से पहचान और अपूर्ण निदान की वजह से नवीनतम उपचारों से वंचित किया जाता है, तो यह न केवल व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर डिमेंशिया से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक बोझ को भी बढ़ा देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान दोधारी होना चाहिए: एक ओर तेज़, सटीक और सुलभ निदान के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करना, और दूसरी ओर क्लिनिकल शोध में भारत को एक प्रमुख साझीदार बनाना। तभी रोगी न केवल रोग को समझ पाएँगे, बल्कि प्रयोगात्मक दवाओं के माध्यम से संभावित राहत भी प्राप्त कर सकेंगे।

Published: May 5, 2026