आईआईटी‑मद्रास की नवीनीकृत ऊर्जा फिनिशिंग स्कूल: सीमित सीटों में युवा कौशल का बड़ा सवाल
भारत सरकार के नवीनीकृत ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) व ITEL फाउंडेशन के सहयोग से आईआईटी‑मद्रास ने छह महीने की रेज़िडेंशियल पावर इलेक्ट्रॉनिक्स फिनिशिंग स्कूल शुरू की है। यह पहल बी.ई./बी.टेक स्नातकों और शुरुआती करियर पेशेवरों को पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, सिस्टम इंटीग्रेशन और नियंत्रण प्रणाली में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करेगी।
प्रोग्राम का प्रत्येक कैंपस में केवल दस छात्रों की ही बॅच है, जबकि देश में लाखों स्नातक अपनी पहली नौकरी की तलाश में हैं। मासिक ₹10,000 का स्टाइपेंड, जो छात्रों के मूलभूत खर्चे कवर कर सकता है, उसी के साथ उद्योग की ओर से प्लेसमेंट की संभावना भी दी गई है।
शिक्षा के इस उछाल को प्रशंसा के साथ ही नीति‑कार्यान्वयन में फटकार मिल रही है। जब देश का लक्ष्य 2030 तक 450 GW नवीनीकृत ऊर्जा स्थापित करना है, तो आधी सौ छात्र ही इस लक्ष्य तक पहुँचाने में योगदान दे पाएँ तो सामाजिक असमानता के सवाल गहरा हो जाता है। सीमित स्थान, उच्च प्रतियोगिता और भौगोलिक अभिगम्यता कई योग्य युवा को इस अवसर से वंचित कर सकती है।
नियमित रूप से सरकारी कौशल विकास पहलों की तुलना में इस कार्यक्रम की चयन प्रक्रिया अधिक कठोर है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नीति‑निर्माण में अक्सर बड़े पैमाने के सामाजिक प्रभाव की अनदेखी की जाती है। जबकि उद्योग को कुशल हाथों की ज़रूरत है, आम जनता को सड़कों पर बुनियादी सुविधाएँ, स्वस्थ्य एवं शिक्षा की उचित उपलब्धता का सवाल अभी भी बना हुआ है।
प्रशासनिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से, MNRE ने इस पहल को जल्द‑से‑जल्द विस्तार करने का वादा किया है, पर वास्तविक समय‑सीमा व बजट आवंटन अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया। इस प्रकार, सरकारी समर्थन की सराहना के साथ, यह प्रश्न उठता है कि क्या इस तरह की उच्च‑तकनीकी प्रशिक्षण मंच केवल कुछ चुने हुए वर्ग को ही लाभ पहुंचा रहे हैं, जबकि व्यापक सामाजिक जरूरतें अभी भी अनसुलझी हैं।
समापन में कहा जा सकता है कि नवीनीकृत ऊर्जा क्षेत्र में कौशल की कमी को पाटने की दिशा में यह कदम सराहनीय है, पर उसके प्रभाव को समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाने के लिए नीतियों को अधिक समावेशी और स्केलेबल बनाना अनिवार्य है।
Published: May 5, 2026