आंतरिक बाधाओं से जकड़े भावनात्मक बंधन: भारत में मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी उजागर
रूमी के एक उद्धरण में कहा गया है, “आपका काम प्रेम की तलाश नहीं, बल्कि वह बाधाएँ हटाना है जो इसे रोकती हैं।” यह विचारधारा आज के भारत में भावनात्मक स्वास्थ्य की जटिल वास्तविकता को ख़ास तौर पर दर्शाती है। बड़ी‑बड़ाई से लिखी जाती सामाजिक नीति के परे, आम नागरिकों को अपने ही मन में निर्मित “सार्कैज़्म की दीवार”, “भूत‑काल के घाव” और “असाध्य उम्मीदें” के कारण प्रेम और स्नेह की अनुभूति से वंचित होना पड़ रहा है।
पिछले दो वर्षों में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 28 % युवाओं को गंभीर अवसाद या चिंताजनक भावनात्मक अड़चनें बताई गई हैं, जबकि केवल 12 % ने पेशेवर मदद प्राप्त की। यह अंतर न केवल व्यक्तिगत समस्याओं को उजागर करता है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की चुप्पी को भी बयां करता है। कई शहरों में सरकारी मनो‑सलाह केन्द्रों की सृष्टि का विज्ञापन किया जाता है, पर उनका अस्तित्व अक्सर कागज़ पर ही सीमित रहता है। “जो फंड आवंटित किया गया है, वह तो बजट दस्तावेज़ों में चमकता है, पर उन डॉलर की ध्वनि सुनाई ही नहीं देती” — यह टिप्पणी अक्सर उन लोगों की जुबान पर आती है जो इस प्रणाली का सामना कर चुके हैं।
शिक्षा विभाग ने “भावनात्मक सीख” को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव रखा है, पर वास्तविक कार्यान्वयन में कई ही स्कूलों ने इसे अपनाया है। गाँव‑गाँव में एक-दो प्रशिक्षित काउंसलर की कमी, साथ ही सामाजिक कलंक की जड़ें, इस योजना को “विचार‑धारा के रूप में” ही रहने देती हैं। परिणामस्वरूप, कई युवा “साझा‑संसाधनों” की अपेक्षा करके ठेले हुए अपने दिलों को प्रेम‑संबंधों में परिवर्तित नहीं कर पाते।
सरकारी स्तर पर, राष्ट्रीय मनोविज्ञान नीति 2023 के तहत 5 हजार करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया, जो 2024‑25 में स्वास्थ्य‑सेवा प्रबंधकों को अनुबंध‑आधारित काउंसलिंग सेवा प्रदान करने के लिए था। लेकिन रिपोर्टों से पता चलता है कि अधिकांश फंडों को “रिपोर्टिंग‑लैग” और “प्रशासनिक मानक‑जाँच” में फँसा दिया गया, जिससे वास्तविक सहायता तक पहुंच नहीं बनी। इस प्रकार की “नीति‑पर‑पॉलिसी” का एकमात्र लाभ यह है कि अभिलेखागार में ‘खर्च’ का आंकड़ा बढ़ता रहता है, जबकि जनता का दुःख बरकरार रहता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक परिवर्तन के लिए दो कदम आवश्यक हैं: पहला, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का “डिज़िटलीकरण” और ग्रामीण क्षेत्रों में टेली‑काउंसलिंग का सशक्तिकरण; दूसरा, सामाजिक मानदंडों को बदलने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर “भावनात्मक साक्षरता” अभियानों को मजबूती देना। अब समय आ गया है कि सरकार केवल “घोषणा‑पत्र” नहीं, बल्कि वास्तविक “सेवा‑पुस्तिका” तैयार करे, जहाँ प्रत्येक नागरिक को अपनी अंदरूनी दीवारें गिराने का मौका मिले, न कि केवल कागज पर लिखी हुई “दोस्त‑सहमति” की।
Published: May 5, 2026