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Category: समाज

अल्कोहल के सहारे दबी विषादता: मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली की धुंधली राह

एक ब्रिटिश लेखिका की आत्मकथा‑उद्धरण ने हाल ही में दिखाया कि कैसे बचपन से ही मनोविकारों का बोझ लेना, कभी‑कभी शराब को तात्कालिक ‘उपचार’ बना देता है। श्वेतवर्षीय कोलोर का संघर्ष, जो कई भारतीयों के समान है, दिखाता है कि जब सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों से मदद नहीं मिल पाती, तो अनियंत्रित शराबी खपत ही एकमात्र ‘दवा’ बन जाती है।

भारत में पिछले पाँच वर्षों में चिंता एवं अवसाद के प्रकरण में दो‑तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023 के अनुसार, लगभग 25 % वयस्कों को तनाव‑संबंधी लक्षणों का सामना करना पड़ता है, पर केवल 10 % ही योग्य परामर्श या दवा प्राप्त कर पाते हैं। अधिकांश ग्रामीण व शहरी गरीब वर्ग, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर हैं, अक्सर लंबी कतारों, स्टाफ की कमी और सामाजिक‑सांस्कृतिक कलंक के कारण इलाज से दूर रह जाते हैं।

ऐसे माहौल में अल्कोहल का सेवन एक ‘जादुई कलश’ बन जाता है – तुरंत राहत देता है, पर दीर्घकालिक रूप से समस्या को और जटिल बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शराब‑आधारित आत्म‑उपचार, न सिर्फ लक्षणों को बढ़ाता है, बल्कि शराब‑निर्भरता जैसा दोहरा रोग भी उत्पन्न कर सकता है। यह द्वि‑ध्रुवीय संकट, जो अक्सर उपचार‑अभाव की धुंध में भुला दिया जाता है, प्रशासनिक कुशलता के अभाव का स्पष्ट संकेत है।

सरकारी स्तर पर 2017 में लागू राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति ने कई आशावादी लक्ष्य निर्धारित किए थे – 2025 तक हर जिले में एक मनोवैज्ञानिक केंद्र स्थापित करना, और राष्ट्रीय हेल्पलाइन को 24‑घंटे सुलभ बनाना। पर वास्तविकता में, अभी तक 30 % जिलों में पर्याप्त मनोवैज्ञानिक शक्ति नहीं है, जबकि हेल्पलाइन पर कॉल का औसत उत्तर समय 48 घंटे से ऊपर है। इस ‘नीति‑कागज़ी’ को अक्सर ‘हवा में कागज की पतंग’ कहा जाता है, क्योंकि जमीन पर उसका प्रभाव नगण्य ही रहता है।

सभी यह दर्शाता है कि व्यक्तिगत त्रासदी केवल ‘अंतःस्थ’ समस्याओं तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक-प्रशासनिक असफलताओं की परछाई है। समाधान के लिए दो प्रमुख दिशा‑निर्देश जरूरी हैं: प्रथम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मनोवैज्ञानिक सेवाओं का अनिवार्य एकीकरण; द्वितीय, शराब‑आधारित आत्म‑उपचार को रोकने हेतु जनजागरूकता अभियान, जिसमें स्कूल‑कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य किया जाए।

जब तक इस तरह की बुनियादी सुधारें नहीं की जातीं, ‘अल्कोहल के सहारे दबी विषादता’ जैसी कहानियाँ निरंतर दोहराएँगी, और राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र की छायादार गलियों में गुनगुनाते रहेंगे।

Published: May 3, 2026