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अमेरिकी नई आतंक‑विरोधी नीति में ड्रग कार्टेल को शीर्ष लक्ष्य, भारत की सीमा‑सुरक्षा और सामाजिक स्वास्थ्य पर उजागर प्रश्न
संयुक्त राज्य अमेरिका ने हाल ही में अपना नया आतंक‑विरोधी रणनीतिक दस्तावेज़ जारी किया, जिसमें पश्चिमी गोलार्ध में ड्रग कार्टेल को सबसे बड़ा खतरा घोषित किया गया है। यह घोषणा, राष्ट्रपति ट्रम्प के हस्ताक्षर के साथ आधिकारिक रूप से लागू हुई, तो अभी भारत के कई राज्यों के लिए नया तनाव‑स्रोत बन गई है।
देश के पश्चिमी सीमा‑राज्य, विशेषकर गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में पहले से ही अंतरराष्ट्रीय नशा‑व्यापार की लहरें चल रही हैं। अमेरिकी नीति के तहत ड्रग कार्टेल को ‘भयभीत करने वाले आतंकवादियों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे संभावित द्विपक्षीय सहयोग, जानकारी‑साझाकरण और सैन्य‑सहायता की दुविधा उत्पन्न होती है। जबकि दिल्ली ने इन मुद्दों को अक्सर ‘अभी‑तक‑निवारण’ कहा है, वास्तविकता में स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं पर नशे की लत के कारण बढ़ता बोझ स्पष्ट है।
इस नई नीति की सबसे बड़ी विडंबना शायद यह है कि जब अमेरिका के दुरुस्तियों की ताल पर ‘ड्रग कार्टेल को मिटाने’ का नारा गूँज रहा है, तब भारत में कई ग्रामीण क्षेत्रों में नशा‑उपयोग के इलाज के लिये बेसिक दवाइयाँ ही नहीं मिल पातीं। शिक्षा संस्थानों में नशा‑रोकथाम के कार्यक्रम तो हैं, पर उनका कार्यान्वयन अक्सर ‘कागज़ी काम’ में सीमित रह जाता है।
प्रशासनिक प्रतिक्रियाएँ भी इस मुद्दे पर बिखरी हुई हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत ‘अमेरिकी दृष्टिकोण का स्वागत करता है’ और ‘साझा रणनीति’ तैयार करने के लिये तैयार है, परंतु कई नागरिक अधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि ऐसे सहयोग से ‘सुरक्षा का बहाना बनाकर मानवाधिकारों की उपेक्षा’ की सम्भावना बढ़ सकती है। इस बीच, जलवायु‑पर्यावरण विभाग जैसी अन्य मंत्रालयें इस विषय में अभी भी ‘अधिक जानकारी की प्रतीक्षा में’ हैं।
नीति‑निर्माताओं की इस टक्कर-भरे माहौल में, सामान्य नागरिकों को दो‑पहिया की सवारी पर, कभी‑कभी धुंधली सरकारी सूचना के साए में, बिखरे ‘सही‑और‑गलत’ के बीच फँसा महसूस होता है। क्या भारत के प्रशासनिक तंत्र में ड्रग‑संबंधी मामलों को प्राथमिकता‑सूची में उतारा जाएगा, यह अभी अनिश्चित ही बना हुआ है।
अंततः, अमेरिकी नई रणनीति ने एक सवाल खड़ा किया है: जब एक महाशक्ति अपने ‘आतंक‑विरोधी’ एजेंडा में ड्रग कार्टेल को शीर्षस्थ मानती है, तब भारत जैसे विकासशील राष्ट्र को अपनी ही नीति‑निर्धारण प्रक्रिया को फिर से परखना ही पड़ेगा। यही वह मोड़ है, जहाँ सामाजिक असमानता, स्वास्थ्य देखभाल और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का मिलाजुला परीक्षण होगा।
Published: May 7, 2026