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Category: समाज

अमेरिका‑इज़राइल नीतियों का 'स्थायी युद्ध' मॉडल, भारत के सामाजिक विकास पर असर

राजनीतिक विश्लेषक डेनियल लेविए ने कहा कि अमेरिकी नीतियों में इज़राइल की कथा इतनी गूँथी गई है कि दोनों अब अलग‑अलग पहचान नहीं रखतीं। यह टिप्पणी, अंतरराष्ट्रीय मंच पर ध्वनिा दी गई, भारत के भीतर सामाजिक-प्रशासनिक प्रश्नों को भी नया आयाम देती दिख रही है।

भारत‑अमेरिका संबंधों में रक्षा‑साझेदारी बढ़ते ही देखी जा रही है, परंतु इस गठबंधन का स्वभाव ‘स्थायी युद्ध’ के समान हो रहा है, जिससे सामाजिक क्षेत्रों में निवेश का अवसर घट रहा है। स्वास्थ्य‑सेवा के नवीनीकरण, शहरी‑ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी ढाँचा, और सार्वजनिक सुविधाओं की पहुँच इस रणनीतिक फोकस के दबाव में धुंधला पड़ता दिख रहा है।

विशेष रूप से आर्थिक असमानता के मुद्दे पर बात करें तो, सैन्य‑औद्योगिक सहयोग के माध्यम से खर्च का बड़ा हिस्सा विदेशी हथियार आयात और रक्षा शोध में जा रहा है। इसका प्रतिफल आम नागरिक को मिलता है? बेहतर स्वास्थ्य केंद्र, नई शिक्षण तकनीकें या सस्ती आवास नहीं। यही कारण है कि निचले और मध्यवर्गीय वर्गों में ‘दुस्साहसिक नीति’ की आलोचना तेज़ी से फड़फड़ाने लगी है।

वहां तक कि भारत‑इज़राइल वाणिज्यिक समझौते भी अक्सर छोटे‑छोटे उद्यमियों के लिए अनदेखी बनी रहती हैं, जबकि बड़े कंपनियों के लिए लाभकारी निकास प्रदान करती हैं। प्रशासनिक प्रतिक्रिया में विदेश मंत्रालय ने कहा कि ये सभी रणनीतिक साझेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में हैं—पर सामाजिक प्राथमिकताओं को यूँ ही ‘स्थायी युद्ध’ की छाया में दबा देना, किस स्तर की नीति‑क्रियान्वयन है?

सार्वजनिक जवाबदेही की बात करें तो, कई नागरिक समूहों ने इस दिशा में स्पष्ट पूछताछ की है। उनको पता है कि राष्ट्रीय बजट में रक्षा के लिए आवंटित राशि के बराबर, अगर उन्हीं को स्वास्थ्य‑शिक्षा में लगाया जाये तो लाखों रोगियों को बेहतर इलाज और अनगिनत विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकती थी। लेकिन ऐसी ही बिचली-बीचली नीति‑परिचर्चा में, ‘विचारधारा के मारिनेट’ में निहित नीति की असली कसरत—सामाजिक विकास की अनदेखी—बार-बार छुपी रही।

विद्युत्‑विभाग और जल आपूर्ति विभाग जैसी नागरिक सुविधाओं के प्रभारी संस्थाएँ अब भी बजट के कटौतियों के कारण अपने प्रोजेक्ट्स को स्थगित करने को मजबूर हैं। इस पर “नीति‑उद्देश्य” की परीक्षा का सवाल उठाता है कि क्या रणनीतिक सहयोग को ‘स्थायी युद्ध’ के रूप में सुदृढ़ करना, जनता की बुनियादी जरूरतों के साथ संतुलन स्थापित कर पा रहा है।

जब तक नीति‑निर्माताओं को ‘स्थायी युद्ध’ की अवधारणा को सामाजिक समावेश से जोड़ने की दिशा में स्पष्ट योजना नहीं बनाते, तब तक यह सवाल बना रहेगा—क्या भारत, विदेश में चल रहे इस राजनीतिक सिम्फनी को अपने घर के कच्चे स्वर के साथ मिला पाएगा, या फिर अपने ही नागरिकों को जोखिम में डाल देगा?

Published: May 4, 2026