अभिलाषी दवाओं पर प्रतिबंध: महिला स्वास्थ्य पर प्रणाली की चुप्पी
संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मिफ़ेप्रिस्टोन (गर्भनिरोधक गोली) की डाक द्वारा डिलीवरी को रोकने का प्रयास करने वाले एक फेडरल अदालत के प्रस्ताव को टाल दिया। अदालत ने इस मामले को देर‑दर‑देर तक टिका कर रखा, जबकि कई महिलाओं का जीवन इस साँचे में फँस गया। यह सिर्फ एक कानूनी अँश नहीं, बल्कि स्वास्थ्य‑सुरक्षा, सामाजिक समानता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का बड़ा प्रश्न है।
2022 में डोब्स फैसले द्वारा रो वि वेड को उल्टा दिया गया था, जिससे राज्यों ने व्यापक गर्भपात प्रतिबंध लागू किए। अनगिनत मामलों में बहु‑प्रांतीय नियम बदलते‑बदलते रहे – एक झरने की तरह, जो महिलाओं के मौलिक अधिकारों को आराम‑से‑साँस लेने नहीं देता। कई क्लीनिकों के बंद होने से ग्रामीण एवं कार्य‑कुशल वर्ग की महिलाओं को निकटतम स्वास्थ्य सुविधा तक पहुँचने के लिए कई घंटे की यात्रा करनी पड़ती है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह एक असंभव बाधा बन जाता है।
गर्भनिरोधक दवाओं की उपलब्धता पर प्रतिबंध का सबसे कड़वा असर तब दिखा, जब कई महिलाएँ अनिच्छित गर्भधारण के कारण शिक्षा‑कार्यक्रम छोड़कर अपने घरों में फँस गईं। इससे न केवल व्यक्तिगत सपने टूटे, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता पर भी असर पड़ा। कई मामलों में, जब गर्भावस्था जीवन‑धमकी बन गई, तो सरकार द्वारा स्थापित अत्यधिक संकीर्ण ‘जीवन‑रक्षा’ अपवाद भी माँ के बचाव में कारगर नहीं सिद्ध हुए; इस कारण कई माँ‑बच्चे मृत्यु के आँकड़ों में शुमार हो गए।
सिस्टम की चुप्पी का सबसे स्पष्ट संकेत है: जब जनता ने इस मुद्दे को उजागर किया, तो अधिकारियों ने वही पुरानी जवाब‑देहलीज दोहराई – “कानून के अंतर्गत निर्णय होगा” – जबकि तथ्य यह है कि मौजूदा नीतियां पहले से ही महिलाओं के अधिकारों को व्यवस्थित रूप से घटा रही हैं। यह प्रशासनिक टालमटोल एक सूखे व्यंग्य से कम नहीं: जैसे ही संसद ने महिला स्वास्थ्य को सूची‑से‑हटाया, मंत्रालय ने वही कॉपी‑पेस्ट उत्तर दे दिया, जो बकवास को ही बकवास बनाये रखता है।
भारत में समान नीति‑पाठ्यक्रम अभी भी विकसित हो रहा है, पर यह उदाहरण दिखाता है कि कानून के नाम पर सार्वजनिक स्वास्थ्य कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। यदि हम सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य सेवाओं की सार्वभौमिक उपलब्धता और महिलाओं की सशक्तिकरण को वास्तविक लक्ष्य बनाना चाहते हैं, तो हमें न केवल मौजूदा क़ानूनों की समीक्षा करनी होगी, बल्कि उन प्रशासनिक कठोरताओं को भी तोड़ना होगा जो अधिकार‑सुरक्षा को इस तरह प्रतिबंधित करती हैं।
Published: May 5, 2026