अभिभावकों की अनजानी हरकतें जो बच्चों के दिल को तोड़ देती हैं
परिवार की नींव पर बचपन की भावनात्मक सुरक्षा का भार अक्सर अभिभावकों की रोज़मर्रा की बातचीत में छिपा रहता है। जब माता‑पिता बिना इरादे के बच्चे की खुशी को खारिज कर देते हैं, उसकी भावनाओं को वैध नहीं मानते, वादे तोड़ देते हैं, सतही व्यवहार पर ज़्यादा ध्यान देते या गलती पर सार्वजनिक बड़बड़ियों में लिप्त हो जाते हैं, तो इन छोटे‑छोटे क्षणों का असर दीर्घकालिक रूप से मनोवैज्ञानिक जख्म बन जाता है।
इन पाँच सामान्य आदतों में भी गहरी सामाजिक जड़ें हैं। पहला, आनंद के क्षणों को नज़रअंदाज़ करना, अक्सर इस धारणा से उत्पन्न होता है कि बच्चे का उत्साह अस्थायी या अनावश्यक है। दूसरा, भावनाओं को अमान्य करना—‘अइतनी बड़ी बात नहीं है’—परिवार को भावनात्मक अभिव्यक्ति से वंचित कर देता है। तीसरा, वादे तोड़ना, जिससे भरोसे का ढांचा ढीला पड़ जाता है। चौथा, व्यवहार पर केवल दंडात्मक फोकस, जो बच्चे को यह समझाता है कि उसका मूल्य केवल परिणामों से जुड़ा है। और पाँचवा, गलती पर सार्वजनिक शर्मिंदा करना, जो आत्म‑सम्मान को निचला गिरा देता है।
समाज के व्यापक वर्ग—शहरी मध्यवर्ग से लेकर ग्रामीण निम्न-आय वर्ग तक—इन पैटर्न से प्रभावित होते हैं। शिक्षा स्तर या आर्थिक स्थिति चाहे कोई भी हो, अधिकांश भारतीय परिवार में अभिभावक-शिक्षित संसाधनों की कमी, मनोवैज्ञानिक सहायता के कमी और कार्य‑जीवन के तनाव से यह व्यवहार प्रचलित है। परिणामस्वरूप, कई बच्चे बढ़ते‑बढ़ते चिंता, अवसाद या सामाजिक अलगाव की समस्याओं का सामना करते हैं, जिससे स्कूल में प्रदर्शन तथा भविष्य की रोजगार संभावनाएँ भी प्रभावित होती हैं।
जब इस समस्या को सामाजिक स्तर पर देखा जाता है, तो प्रशासनिक प्रतिक्रिया अक्सर ‘अभी कोई बड़ी नीति नहीं है’ की चुप्पी में सिमट जाती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में बाल-मानसिक स्वास्थ्य के लिये केवल एक बुनियादी ट्यूरिंग जोड़ना, और राज्य‑स्तर पर पेडागॉजिकल प्रशिक्षण में यह विषय ‘वैकल्पिक’ माना जाता है, यह दर्शाता है कि नीति‑निर्माताओं ने इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। दुर्भाग्य से, कई योजनाओं की घोषणा के बाद प्रमुख दस्तावेज़ों में अभिभावक प्रशिक्षण मॉड्यूल की कमी रह जाती है—एक ऐसा ‘सिर पर बॉल’ जो अक्सर हिलाया जाता है लेकिन जमीन पर नहीं उतरता।
सिस्टमिक सुधार के लिए कुछ व्यावहारिक कदम आवश्यक हैं। पहला, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बाल-मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग को अनिवार्य बनाना और साथ ही अभिभावक परामर्श वार्ता को जोड़ना। दूसरा, स्कूल पाठ्यक्रम में ‘भावनात्मक साक्षरता’ को अनिवार्य विषय बनाकर अभिभावकों को नियमित कार्यशालाओं के माध्यम से संवेदनशीलता बढ़ाना। तीसरा, स्थानीय स्वयंसेवी समूहों को वित्तीय सहयोग देकर सामुदायिक‑आधारित अभिभावक समर्थन समूह स्थापित करना। अंत में, राष्ट्रीय नीति‑निर्धारण में ‘बाल भावनात्मक सुरक्षा’ को एक मापदंड के रूप में सम्मिलित करना ताकि उन योजनाओं के लिए संसाधन आवंटन स्पष्ट हो।
सारांश में, अभिभावक बिना इरादे के जो भावनात्मक जख्म उत्पन्न करते हैं, वे व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य के बड़े मुद्दे बनते जा रहे हैं। प्रशासन का मौन, योजनाओं की अधूरी प्रतिबद्धता और नीति‑निर्माताओं की ‘सुरक्षा‑जाल’ तैयार करने में लापरवाही को अब निरखना आवश्यक है। तभी हम एक ऐसा भारत बना पाएंगे जहाँ बच्चों का दिल सिर्फ खेल‑खुशियों से नहीं, बल्कि सम्मान और समझ के साथ धड़कता रहे।
Published: May 5, 2026