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Category: समाज

अधिक सिंचाई से फसलें झेल रही हैं जड़ क्षय की मार: किसानों की बढ़ती परेशानी

विंटर 2026 की शुरुआत में यूपी, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में कई किसानों ने बताया कि उनकी धान, मक्का और गेंहू की क़िस्में जलभरी मिट्टी के कारण जड़ क्षय (रूट रॉट) की बीमारी से जूझ रही हैं। ऐसा तब होता है जब बूँदाबूँदी या डुबकी भर सिंचाई से मिट्टी अत्यधिक नमी से भर जाती है, जिससे जड़ें ऑक्सीजन से वंचित हो जाती हैं और फंगल संक्रमण का ग्रास ठहर जाता है। परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि रुकती है, पात मुरझाते हैं और अंततः फसल का उत्पादन घट जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या केवल प्राकृतिक मौसमी कारकों से नहीं, बल्कि प्रशासनिक नीतियों की चूक से भी उत्पन्न हो रही है। कई राज्यों में मुफ्त बिजली, सस्ती डीज़ल सब्सिडी और जलसेवा योजनाओं के तहत बड़े पैमाने पर टबिंग पंपों की खरीद को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि इस प्रोत्साहन के साथ जल निकासी व्यवस्था, गीले खेतों के उचित प्रबंधन और सूक्ष्म जलविज्ञान पर ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप, सूखे के समय जलसंकट में पड़ते हुए भी किसान लगातार अधिक पानी डालते हैं, जिससे जमीन में जलज stagnation बढ़ जाता है।

किसानों ने बताया कि पिछले तीन फसल चक्रों में औसत पैदावार में 25‑30% की गिरावट देखी गई है, जिससे उनकी आय में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई है। कई छोटे और किरायेदार किसान आधे साल की मेहनत से बनी बची फसल को बाजार में बेचने के बजाय अपने घर में रखकर भी नकार रहे हैं, क्योंकि बिगड़ते हुए धान के दाने की कीमत घट गई है। इस आर्थिक दबाव ने कई ग्रामीण इलाकों में किसान ऋण स्तर को नई ऊँचाई पर पहुँचा दिया है।

इन समस्याओं के बावजूद, राज्य सरकारों ने अभी तक कोई ठोस जल निकासी पहल नहीं की है। कुछ राज्यों ने ‘ड्रेनेज़ कनेक्ट’ योजना की घोषणा की थी, परन्तु कार्यान्वयन में देरी और नकदी प्रवाह की कमी के कारण यह योजना अभी कच्ची धरती पर ही अटक गई है। किसानों ने अपने प्रतिनिधियों को लिखे पत्रों में इस बात पर ज़ोर दिया कि जबकि वर्गीकरण के आधार पर ‘सिंचाई कोट’ दिया जाता है, जल निकासी के लिए कोई बजट नहीं निकाला जा रहा।

स्प्रेडिंग से बचाव के उपाय में विशेषज्ञों ने कहा कि खेतों में उचित समय पर जल निकासी की जाँच, ड्रिप इरिगेशन या माइक्रो-स्प्रे सिस्टम का उपयोग, तथा फसल के अनुसार सही मिट्टी मिश्रण तैयार करना आवश्यक है। साथ ही, पश्चात‑कटाई में जड़ों की जाँच कर उन्हें क्षतिग्रस्त भागों से मुक्त करना भी लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

इन समस्याओं को हल करने के लिए नीतियों में बदलाव की जरूरत स्पष्ट है: फसल‑आधारित जल उपयोग मानदंड, सूक्ष्म‑जलविज्ञान सर्वे, और जल निकासी बुनियादी ढांचे पर त्वरित खर्च। अन्यथा, अत्यधिक सिंचाई से उत्पन्न जड़ रोग न केवल किसानों की आजीविका को धोखा देगा, बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और जल संसाधन प्रबंधन को भी खतरे में डाल देगा। जैसा कि कहा जाता है, “पौधे को सही नमी चाहिए, वैसे ही किसान को भी सही नीति चाहिए।”

Published: May 5, 2026