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Category: समाज

अत्यधिक बौद्धिक क्षमता वाले बच्चों की पहचान में प्रणाली की चूक

भारत में बच्चे अक्सर सामाजिक‑आर्थिक सीमाओं के बोझ में दबे होते हैं, पर कुछ बच्चों की मानसिक तेज़ी ऐसी होती है कि यदि समय पर पहचानी न जाए तो वे अपनी क्षमता को बिखेर कर सामान्य कक्षा में घुल‑मिल जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक बौद्धिक क्षमता वाले बच्चों के प्रारंभिक संकेत बहुत स्पष्ट नहीं होते; ये बिखरे‑बिखरे, सूक्ष्म और अक्सर भावनात्मक रूप से जटिल होते हैं। यह तथ्य शिक्षा‑प्रणाली की मौजूदा ढीलापन को उजागर करता है, जहाँ पहचान‑आधारित सहयोग के बजाए एक‑समान पाठ्यक्रम ही प्रमुखता रखता है।

वर्तमान में भारत में ‘गिफ्टेड एंड एडवांस्ड लर्नर’ (GAL) के लिए कोई राष्ट्रीय मानक नहीं है। अधिकांश स्कूलों में शिक्षक प्रशिक्षण में भी इस विशेष वर्ग की समझ का अभाव है। परिणामस्वरूप, कई माता‑पिता को अपने बच्चे के असामान्य व्यवहार को ‘शरारत’, ‘अत्यधिक जिज्ञासा’ या ‘ध्यान‑भंग’ के रूप में लेबल करना पड़ता है, जबकि वास्तविक मुद्दा पहचान की कमी है। अधीर प्रशासन अक्सर आत्मसंतुष्ट रिपोर्टें जारी करता है, जो केवल न्यूनतम आँकड़े दिखाए रखती हैं—जैसे कि “५% स्कूलों में विशेष टैलेंट स्काउटिंग”—पर वास्तविक जमीन पर लागू होने वाली योजना का कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं है।

नीचे दस ऐसे प्रारम्भिक संकेतों की सूची दी गई है, जिन्हें स्कूल‑प्रशासन, शिक्षक‑संघ और नीतिनिर्माताओं को गंभीरता से लेनी चाहिए:

इन संकेतों को सही तौर पर पहचानने हेतु स्कूलों को प्रशिक्षित स्काउटिंग टीमों, पेरेंट‑ट्यूटर मीटिंग्स और विशेष शैक्षणिक योजना की आवश्यकता है। परंतु बजट आवंटन के दस्तावेज़ों में अक्सर ‘समावेशी शिक्षा’ को एक सतही शब्द‑समूह के रूप में ही रखा गया है, जबकि वास्तव में विशेष कार्यक्रमों के लिए फंडिंग नहीं की जाती। ऐसे में, नीति‑निर्माताओं को ‘सेवा‑केंद्रित’ के बजाय ‘रिपोर्ट‑केंद्रित’ कहा जा सकता है—जहाँ मात्र रिपोर्ट बनाना आसान है, पर वास्तविक बदलाव लाना जटिल।

समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए यह प्रश्न उठता है: क्या हम उन बच्चों को उनकी प्राथमिक शैक्षिक वर्ष में ही सशक्त बना सकते हैं, या फिर उन्हें आगे बढ़ते समय लगातार अपर्याप्त सुविधाओं के साथ जूझते रहना पड़ेगा? विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रारम्भिक पहचान ही भविष्य की सामाजिक समानता की कुंजी है। यदि प्रशासन अपनी ‘व्यावहारिक योग्यता’ को प्राथमिकता नहीं देता, तो यह असमानता और भी गहरी हो जाएगी, और राष्ट्र के बौद्धिक पूँजी में अछूती संभावनाएँ बिखरती रहेंगी।

आखिरकार, केवल उन नीतियों पर गर्व नहीं करना चाहिए जो कागज़ पर सुंदर दिखती हैं; उन नीतियों को जमीन पर उतारने की वास्तविक क्षमता ही भारत की शैक्षणिक प्रणाली को ‘स्मार्ट’ बना सकती है।

Published: May 5, 2026